गुरु पूर्णिमा

सकल चराचर में कोई, नहीं पद गुरु समान।
ब्रह्म- जीव में भी कोई, नहीं जस गुरु महान।
अपरम्पार महिमा गुरु की, जाने सकल जहान।
ईश्वरतुल्य प्रेम करुणामयी, अगणित सद्गुण खान।
अतुलित सत्यनिष्ठ ओजमयी, जाए न महिमा बखान।
अज्ञानी को ज्ञान दे, लगाये नइया  पार।
छुड़ा जगत के भवबंधन, सागर से दे तार।
गीली माटी नित गढ़-गढ़, देवे नव आकार।
परख योग्यता भिन्न-भिन्न, गढ़े नये आयाम।
दे उत्तम आचार-विचार, सिखलाये योग-व्यायाम।
अवगुण शिष्य के दूर कर, सद्गुण करे विकास।
अज्ञान का तिमिर मिटाकर, ज्ञान का करे प्रकाश।
दे प्यार संग में संस्कार, सुसंस्कृत करे समाज।
बना शिष्य नागरिक उत्तम, नवयुग करे आगाज़।
डाँट-डपट कभी मनुहार, कभी ममता मात समान।
सभ्य समुन्नत देश बना, दिलवाये मान-सम्मान।
परम्परा गुरु-शिष्य की, है आज भी अपरम्पार।
कोटि-कोटि अर्पण नमन, है वन्दन बारम्बार....

रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

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