तत्सम तद्भव
संस्कृत शब्द कहलाते तत्सम, परिवर्तित रूप तद्भव।
तत्सम मतलब संस्कृत के समान, उससे उत्पन्न तद्भव।।
अंबा बन गई अम्मा, कर्म हो गया काम।
सायं हो गई शाम, आम्र कहलाता आम।।
वर्ष बन गया बरस, श्वांस बन गई साँस।
यश हो गया जस, श्वश्रु कहलाती सास।
मक्षिका बन गई मक्खी, मुष्टि हो गई मुट्ठी।
अस्थि बन गई हड्डी, मृत्तिका कहलाती मिट्टी।।
काष्ठ हो गया काठ, ग्रंथि बन गई गाँठ।
उष्ट्र बन गया ऊँट, अष्ट कहलाता आठ।
चंद्र बन गया चाँद, नृत्य हो गया नाच।
ग्राम बन गया गाँव, पञ्च बन गया पाँच।।
चर्मकार कहलाता चमार, प्रस्तर बन गए पत्थर।
कुंभकार बन गया कुम्हार, शर्करा बन गई शक्कर।।
पीत बन गया पीला, शाक हो गया साग।
नासिका बन गई नाक, सप्त हो गया सात।।
भित्ति बन गई भीत, चणक बन गया चना।
मित्र बन गए मीत, स्वर्ण हो गया सोना।।
अग्नि बन गई आग, वाष्प बन गई भाप।
दंत हो गए दाँत, सर्प बन गए साँप।।
अक्षि बन गई आँख, रुक्ष हो गया रूखा।
लक्ष हो गया लाख, शुष्क कहलाता सूखा।।
निद्रा बन गई नींद, छिद्र बन गया छेद।
बिंदु बन गई बूँद, ज्येष्ठ कहलाता जेठ।।
शिर बन गया सिर, वानर कहलाता बंदर।
क्षीर बन गई खीर, कातर हो गया कायर।।
पर्यंक कहलाता पलंग, कंगन बन गये कंकण।
रत्न बन गये रतन, कृष्ण कहलाते किशन।।
रचयिता
ऋतु सिंघल,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अंबेहटा चांद-1,
विकास खण्ड- रामपुर मनिहारान,
जनपद- सहारनपुर।
तत्सम मतलब संस्कृत के समान, उससे उत्पन्न तद्भव।।
अंबा बन गई अम्मा, कर्म हो गया काम।
सायं हो गई शाम, आम्र कहलाता आम।।
वर्ष बन गया बरस, श्वांस बन गई साँस।
यश हो गया जस, श्वश्रु कहलाती सास।
मक्षिका बन गई मक्खी, मुष्टि हो गई मुट्ठी।
अस्थि बन गई हड्डी, मृत्तिका कहलाती मिट्टी।।
काष्ठ हो गया काठ, ग्रंथि बन गई गाँठ।
उष्ट्र बन गया ऊँट, अष्ट कहलाता आठ।
चंद्र बन गया चाँद, नृत्य हो गया नाच।
ग्राम बन गया गाँव, पञ्च बन गया पाँच।।
चर्मकार कहलाता चमार, प्रस्तर बन गए पत्थर।
कुंभकार बन गया कुम्हार, शर्करा बन गई शक्कर।।
पीत बन गया पीला, शाक हो गया साग।
नासिका बन गई नाक, सप्त हो गया सात।।
भित्ति बन गई भीत, चणक बन गया चना।
मित्र बन गए मीत, स्वर्ण हो गया सोना।।
अग्नि बन गई आग, वाष्प बन गई भाप।
दंत हो गए दाँत, सर्प बन गए साँप।।
अक्षि बन गई आँख, रुक्ष हो गया रूखा।
लक्ष हो गया लाख, शुष्क कहलाता सूखा।।
निद्रा बन गई नींद, छिद्र बन गया छेद।
बिंदु बन गई बूँद, ज्येष्ठ कहलाता जेठ।।
शिर बन गया सिर, वानर कहलाता बंदर।
क्षीर बन गई खीर, कातर हो गया कायर।।
पर्यंक कहलाता पलंग, कंगन बन गये कंकण।
रत्न बन गये रतन, कृष्ण कहलाते किशन।।
रचयिता
ऋतु सिंघल,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अंबेहटा चांद-1,
विकास खण्ड- रामपुर मनिहारान,
जनपद- सहारनपुर।

Bahut hi badhiya 🙏
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