कुछ सोचा है क्या

कुछ सोचा है क्या?
कुछ सोचा है क्या?

सर्वत्र फैला है प्रदूषण
जल वायु ध्वनि या मृदा प्रदूषण
पर्यावरण कर रहा चीत्कार
कुछ सोचा है क्या?
जल ही कल है
बिन जल न इक पल है
जल की कल-कल सुन न पाओगे
बिन जल एक दिन जल जाओगे
कुछ सोचा है क्या?
वाहनों का शोर बहुत है
धुँआ -धुँआ हर ओर बहुत है
साँस भी लेना हुआ है मुश्किल
बीमारियाँ चहुँओर बहुत हैं
गिर जाओगे मिट जाओगे
कुछ सोचा है क्या?
खेत-खलिहानों का देश है अपना
पर उत्पादकता की होड़ की दौड़ है
कृत्रिम उर्वरक के उपयोग का ज़ोर है
धन से क्या तुम पेट भरोगे
बिन अन्न क्या एक दिन रह पाओगे
कुछ सोचा है क्या?
जलवायु को स्वच्छ बनाना है
जैविक खेती को अपनाना है
वृक्षारोपण को भी बढ़ाना है
ये सोचा है अब
ये करना है अब।

रचयिता
अंशु सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय भिक्कनपुर,
विकास खण्ड-रजापुर,
जनपद-गाजियाबाद।

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