स्वामी विवेकानंद

तीव्र बुद्धि वाले
एक महान संत,
परमात्मा को पाने की लालसा
थी उनमें अनन्त।

गुरु रामकृष्ण परमहंस ने
ऐसा शिष्य था पाया,
गुरुसेवा गुरुभक्ति में लीन
त्याग दी जिसने मोहमाया।

आध्यात्म-विद्या के बिना
विश्व हो जाएगा अनाथ,
ऐसी दिव्य सोच रखते थे
आदरणीय नरेन्द्र नाथ।

गुरु के समक्ष आत्म साक्षात्कार से
मिला असीम आनंद,
अब  नरेंदनाथ से बन चुके थे         
         स्वामी विवेकानंद।

विश्वधर्म-सम्मेलन(1893) में
अदभुत ज्ञानदीप जलाया,
भारत के गौरव को
विश्व भर में फैलाया।

भारत के आध्यात्मिक खजाने की
महक से सारा जहाँ महकाया,
आज ही के दिन चार जुलाई को
अपना पवित्र देह त्याग दिया।

रचयिता
मंजू गुसांईं,
सहायक अध्यापक,
राजकीय आवासीय प्राथमिक विद्यालय थराली,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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