धरती के भगवान

ऊपर वाले भगवान की
 पूजा हम सब करते हैं।
 आओ धरती के भगवानों से
 आज हम सब मिलते हैं।।
       वह नहीं देखते जाति धर्म
       करते रहते अपना कर्म
       पहन सफेद चोला चले हैं
       अपने कर्तव्य पथ पर डटे हैं।
आओ धरती के भगवानों से
आज हम सब मिलते हैं।
      खाने-पीने, आराम का होश नहीं
      घर परिवार अपनों से दूर यहीं
      एक-एक जान के लिए लड़ रहे
      यमराज को भी चुनौती दे रहे।
आओ धरती के भगवानों से
आज हम सब मिलते हैं।
        भारी-भरकम पीपीई किट पहनकर
        गर्म उमस भरे दिन-रातों को सहकर
        ऊपर से नीचे तक ढके हुए अड़े हैं।                       
        जीवन की डोर को पकड़े खड़े हैं।
आओ धरती के भगवानों से
आज हम सब मिलते हैं।
         हम भी अपनी साँसों की डोर
         उन्हें विश्वास से देते हैं सौंप
         उस विश्वास पर खरा उतरने के लिए
         अपना पूरा सामर्थ्य देते हैं झोंक।
आओ धरती के भगवान से
आज हम सब मिलते हैं।
         दूसरे का जीवन बचाते हुए
         अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं
         उन धरती के भगवान "डाॅक्टर" को
         सर अपना झुकाकर सम्मान देते हैं
आओ धरती के भगवानों से
आज हम सब मिलते हैं।
     
रचयिता
रेखा नेगी रावत,
सहायक अध्यापक,
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय खंदूखाल,
विकास क्षेत्र-कोट,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. सुन्दर रचना

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  2. बहुत ही सुंदर कविता है

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