बढ़ती जाती जनसंख्या

बढ़ती जाती नित जनसंख्या, घटती जाती सुविधाएँ,
सुनो धरा की करुण व्यथा, सुन कोई मानव को  समझाये...

न बढ़ रही है ये धरती और न ही बढ़े कभी अम्बर है।
प्रकृति के सब स्रोत घट रहे, छोटे बनते अब घर हैं।
बस हर पल बढ़ रही है गिनती और बढ़ रही जन्म दर है।
जितनी गति से बढ़ रही जन्म दर, उतनी धीमी मृत्यु दर है।
सुनो धरा की करुण व्यथा, सुन कोई मानव को  समझाये...

सन्तुलन बिगड़ रहा बोझ से, चारों ओर प्रदूषण है।
पॉलीथिन उग रही खेत में, फसलें सारी चौपट हैं।
वनस्पति समाप्त हो रही, बस कंक्रीट के जंगल हैं।
पशु-पक्षी के विचरण स्थल पर,  मानव करते दंगल हैं।
सुनो धरा की करुण व्यथा, सुन कोई मानव को समझाये...

केवल जनसंख्या बढ़ रही, घटे रोजगार के अवसर हैं।
केवल महँगा बढ़ रही, घटे देश की विकास दर है।
अपराध पाँव पसार रहा, नैतिकता का होता ह्रास है।
नित प्रतिपल जनसंख्या वृद्धि, संस्कृति सभ्यता का परिहास है।
सुनो धरा की करुण व्यथा, सुन कोई मानव को  समझाये....

हे मानव अब नींद से जागो, वरना बस पछताना है।
कर लो नियंत्रित जनसंख्या को, यदि धरती को बचाना है.....

रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

Comments

Total Pageviews