गुरु ज्ञान है

 पत्थर  को  तराशकर
 सुंदर  मूर्ति  बनाता।
 उस  पर  प्राण  भर
 अनेक  रंग  सजता।

तमस के अंधकार से
प्रकाश मार्ग  ले जाता।
चारों दिशाएँ महकाकर
सम्पूर्ण जगत में बिखराता।

माँ की ममता से परिपूर्ण
हर शैतानी को सहता।
कभी पिता सा गम्भीर बन,
पथ प्रदशक  भी बनता।

शिखरों की ऊँचाई नापना
समुद्र की गहराई जानना।
सभी वेद, पुराण, धर्म, शास्त्र,
मानवता का सच्चा पाठ पढ़ाते

ज्ञान के  प्रकाश स्तम्भ से
सब मन प्रकाश भर देते।
मासूम गीली  मिट्टी  को
कुम्हार सा सुंदर, सुदृढ़ बनाते।

छोटी -छोटी उँगुलियों को
धीरे-धीरे हिलना सिखाते।
नन्हें   नन्हें  पैरों   से
आगे बढ़ना सिखाते।

गुरु नहीं तुम परमेश्वर हो
सारे जग के पथ  प्रदर्शक।
सबके जीवन भरते उजाले,
अपने  अथक  प्रयासों  से।

वाणी  है अमृत तुल्य
कानों में  घुल   जाती है।
नन्हें से बाल  मन  को
मधुर संगीत दे जाती है।

रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग, 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. वाह ! बहुत सुंदर रचना ,नमन ।

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  2. अति सुंदर कविता दी👌👌👌👌

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