पर्यायवाची
एक ही अर्थ को करें प्रकट,शब्द अनेक समानार्थी।
वही कहलाते पर्यायवाची, वही कहलाएँ समानार्थी।।
भारती कहो, शारदा कहो या कहो वीणापाणि।
विद्या की देवी सरस्वती, वही कहलाये हंसवाहिनी।।
भृत्य कहो, सेवक कहो, दास कहो या नौकर।
परिचायक भी है वही, वही कहलाते अनुचर।।
नभ कहो या शून्य कहो, कहो व्योम या कहो गगन।
छू लो तुम आकाश को, वही कहलाता अनंत।।
आँख कहो, दृग कहो, कहो नेत्र या नयन।
दृष्टि, अक्षि, चक्षु वही, वही लोचन, विलोचन।।
ईश कहो, चाहे प्रभु कहो, दीनबंधु चाहे परमेश्वर।
वही जगदीश, वही परमात्मा, वही हमारे ईश्वर।।
इंद्र कहो, सुरेश कहो, कहो देवेश या देवेंद्र।
वही पुरंदर, सुरपति, नम: देवराज सुरेंद्र।।
उत्कर्ष करो, उन्नति करो, करो प्रगति और उदय।
करते चलो विकास, तरक्की, उन्नयन और अभ्युदय।।
कमल कहो, नीरज कहो, कहो राजीव या पंकज।
वही पद्म, शतदल वही, वही सरसिज, वही जलज।।
चंद्रमा कहो, इंदु कहो, कहो विधु या मयंक।
राकेश वही, वही हिमांशु, वही सुधाकर या शशांक।।
सर कहो, चाहे ताल कहो, कहो तड़ाग या पोखर।
वही जलाशय, पुष्कर वही, वही मानसरोवर।।
बेटा ही तो सुत, पुत्र है पूत, तनय और तनुज।
वही लड़का, वही कुमार, वही कहलाता आत्मज।।
सूर्य कहो, भानु कहो, कहो रवि या भास्कर।
वही कहलाये अरुण, सविता, वही होता प्रभाकर।।
रात कहो, रैन कहो, कहो निशा या रजनी।
वही रात्रि, वही राका, कादंबरी वही यामिनी।।
असुर कहो, राक्षस कहो, कहो दैत्य निशाचर।
वही कहलाता रात्रिचर, वही कहलाये रजनीचर।।
विधि कहो, प्रजापति कहो, चाहे कहो विधाता।
स्रष्टा वही, ब्रह्मा वही, वही है सृष्टि निर्माता।।
रचयिता
ऋतु सिंघल,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अंबेहटा चांद-1,
विकास खण्ड- रामपुर मनिहारान,
जनपद- सहारनपुर।
वही कहलाते पर्यायवाची, वही कहलाएँ समानार्थी।।
भारती कहो, शारदा कहो या कहो वीणापाणि।
विद्या की देवी सरस्वती, वही कहलाये हंसवाहिनी।।
भृत्य कहो, सेवक कहो, दास कहो या नौकर।
परिचायक भी है वही, वही कहलाते अनुचर।।
नभ कहो या शून्य कहो, कहो व्योम या कहो गगन।
छू लो तुम आकाश को, वही कहलाता अनंत।।
आँख कहो, दृग कहो, कहो नेत्र या नयन।
दृष्टि, अक्षि, चक्षु वही, वही लोचन, विलोचन।।
ईश कहो, चाहे प्रभु कहो, दीनबंधु चाहे परमेश्वर।
वही जगदीश, वही परमात्मा, वही हमारे ईश्वर।।
इंद्र कहो, सुरेश कहो, कहो देवेश या देवेंद्र।
वही पुरंदर, सुरपति, नम: देवराज सुरेंद्र।।
उत्कर्ष करो, उन्नति करो, करो प्रगति और उदय।
करते चलो विकास, तरक्की, उन्नयन और अभ्युदय।।
कमल कहो, नीरज कहो, कहो राजीव या पंकज।
वही पद्म, शतदल वही, वही सरसिज, वही जलज।।
चंद्रमा कहो, इंदु कहो, कहो विधु या मयंक।
राकेश वही, वही हिमांशु, वही सुधाकर या शशांक।।
सर कहो, चाहे ताल कहो, कहो तड़ाग या पोखर।
वही जलाशय, पुष्कर वही, वही मानसरोवर।।
बेटा ही तो सुत, पुत्र है पूत, तनय और तनुज।
वही लड़का, वही कुमार, वही कहलाता आत्मज।।
सूर्य कहो, भानु कहो, कहो रवि या भास्कर।
वही कहलाये अरुण, सविता, वही होता प्रभाकर।।
रात कहो, रैन कहो, कहो निशा या रजनी।
वही रात्रि, वही राका, कादंबरी वही यामिनी।।
असुर कहो, राक्षस कहो, कहो दैत्य निशाचर।
वही कहलाता रात्रिचर, वही कहलाये रजनीचर।।
विधि कहो, प्रजापति कहो, चाहे कहो विधाता।
स्रष्टा वही, ब्रह्मा वही, वही है सृष्टि निर्माता।।
रचयिता
ऋतु सिंघल,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अंबेहटा चांद-1,
विकास खण्ड- रामपुर मनिहारान,
जनपद- सहारनपुर।

बहुत सुंदर प्रस्तुति। सराहनीय।
ReplyDeleteधन्यवाद महोदय
Deleteवाह दीदी, बहुत सुंदर तरीके से अपने पर्यायवाची सिखा दिए।👌👌👌👌
ReplyDeleteThanks dear mam
DeleteVery nice ma'am
ReplyDeleteThanks
DeleteBahut sunder
ReplyDeleteVery nice
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