शक्ति दर्शन-1...मेरे मन की बात आत्मसम्मान, अंजू चौबे. पू.मा.वि. केराकतपुर

★शक्ति दर्शन :-1★
मेरे मन की बात........... मेरा आत्मसम्मान
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"मैं एक नारी हूं हस  कर निछावर कर दूंगी तुम पर अपनी जान 

बस मेरे आत्मसम्मान को ठेस न लगाना नहीं तो मैं न रखपाऊंगी तुम्हारा मान "
         आज मुझे मिशन शिक्षण संवाद की जनपद की एडमिन श्रीमती सरिता राय जी ने मन की बात श्रृंखला के अंतर्गत अपने विचार व्यक्त करने के लिए कहा और जब मैंने आत्मसम्मान विषय को कलमबद्ध करना शुरू किया तो पाया  कि आत्म सम्मान एक ऐसी औषधि के समान है जिसका की कोई साइड इफेक्ट नहीं है और हर हाल में इसके द्वारा रोग से निदान संभव ही है। 
इस बात के संदर्भ में मैं इसे एक सच्ची कहानी द्वारा बताना चाहूंगी:- 
 मेरी बहुत करीबी मित्र मृणालिनी जिसे ईश्वर ने सभी जिसे बाह्य और आंतरिक सौंदर्य और गुणों से  नवाजा था फिर भी उसमें घमंड लेश मात्र का भी नहीं था और वह विनम्रता की मिसाल भी थी।    
        शिक्षा पूरी करने के पश्चात उसने मनचाही नौकरी ज्वाइन कर ली और एक अच्छे घर  में , समृद्धि घर में उसका रिश्ता भी हो गया था।  पति और उसके ससुराल वाले सभी उसके रूप और गुण के  कायल थे पर सभी को सिर्फ एक परेशानी थी-  मृणालिनी के नौकरी करने से। उनकी  नजर में घर की बहू बेटियां अगर बाहर नौकरी करें तो उससे बड़ा कोई कलंक नहीं,  कोई और अवगुण  नहीं । बस उनकी नजर में  उसका यही दोष  सभी गुणों पर भारी पड़ गया  और उसे नौकरी छोड़ने के लिए येन केन प्रताड़ित किया जाने लगा ।
          पर मृणालिनी के लिए नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं थी उसका आत्म सम्मान था उसका संबल था । वह कैसे समझौता कर पाती उससे ? लिहाजा ससुराल मैं उसके लिए अब कोई जगह नहीं थी --------- 
        पर मृणालिनी ने इस अपमान से भी आत्मसम्मान के औषधि के सहारे उबर पाने में कामयाबी पाई । 
    वक्त ने करवट बदला और मृणालिनी  के पति असाध्य रोग से ग्रसित हो गए और उनकी नौकरी छूट गई । सभी बंधु बंधुओं ने उनसे किनारा कर लिया । सूचना मिलते ही मृणालिनी उन्हें अपने साथ ले आई और उनका इलाज करवाने में जुट गई डॉक्टर के यह कहने पर कि अगर कुछ देर और हो जाती तो शायद इनका जीवन बचाना कदापि संभव नहीं होता और उसी वक्त जब मैंने उन्हें देखा तो पाया कि बोल पाने में असमर्थ उसके पति के आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी  ।  मृणालिनी का तो मुझे पता नहीं पर मुझे बहुत ही शांति , सुकून का अहसास हुआ कि चलो उन्हें ना सही उनके आंसुओं को तो मृणालिनी के आत्मसम्मान की कीमत पता है और जब मैं मृणालिनी की तरफ देखा तो देखा कि  वह बिना किसी शिकन शिकायत के उनकी तीमारदारी में जुटी हुई थी । 
सच में यह आत्मसम्मान ही तो  था जिसकी वजह से मां सीता ने अपना सब कुछ त्याग कर दिया था।

 उसके बाद मैंने मन ही मन मृणालिनी के आत्म सम्मान की ताकत को प्रणाम किया और प्रभु से प्रार्थना की हे प्रभु कुछ देना या मत देना पर सभी को आत्म सम्मान की ताकत अवश्य ही  देना ।

अंजू चौबे
सहायक अध्यापक 
पूर्व माध्यमिक विद्यालय केराकतपुर,
वाराणसी
संकलनकर्ता:-
श्रीमती सरिता रॉय 
टीम मिशन शिक्षण संवाद शक्ति समूह

Comments

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, आत्मसम्मान, सबसे बड़ा सम्मान

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