क्षय रोग की कहानी
24 मार्च-विश्व क्षय रोग दिवस
रक्त की वो उल्टियाँ थीं, वजन में गिराव था,
देखते ही मर्म जगे, 'क्षय रोग' का प्रभाव था।
तब न कोई चेतना थी, न कोई इलाज था,
दृश्य बहुत कष्टमय था, दर्द में समाज था।
फिर समय ने साथ दिया, इलाज इसका मिल गया,
मनुष्यता की लाज में, एक और पृष्ठ जुड़ गया।
अब हर तरफ बचाव है, सुरक्षा का सुझाव है,
जैसे लक्षण दिखने लगे, वैसे ही घिराव है।
जिसने लग के कर लिया, उसका ही इलाज है,
गर बीच में ही छोड़ दिया, तो फिर ये लाइलाज है।
है चाह कि भविष्य में, न इसका कोई मरीज़ हो,
जड़ से मिटे ये कलंक, न इसका कोई बीज हो।
न इसका कोई बीज हो।।
रचयिता
दीक्षा मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय असनी द्वितीय,
विकास खण्ड-भिटौरा,
जनपद-फतेहपुर।
रक्त की वो उल्टियाँ थीं, वजन में गिराव था,
देखते ही मर्म जगे, 'क्षय रोग' का प्रभाव था।
तब न कोई चेतना थी, न कोई इलाज था,
दृश्य बहुत कष्टमय था, दर्द में समाज था।
फिर समय ने साथ दिया, इलाज इसका मिल गया,
मनुष्यता की लाज में, एक और पृष्ठ जुड़ गया।
अब हर तरफ बचाव है, सुरक्षा का सुझाव है,
जैसे लक्षण दिखने लगे, वैसे ही घिराव है।
जिसने लग के कर लिया, उसका ही इलाज है,
गर बीच में ही छोड़ दिया, तो फिर ये लाइलाज है।
है चाह कि भविष्य में, न इसका कोई मरीज़ हो,
जड़ से मिटे ये कलंक, न इसका कोई बीज हो।
न इसका कोई बीज हो।।
रचयिता
दीक्षा मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय असनी द्वितीय,
विकास खण्ड-भिटौरा,
जनपद-फतेहपुर।

👌👌🙏🙏
ReplyDeleteYour words are too good
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