शहीद दिवस

कतरा-कतरा खून  का  देकर,
       हमें  आजादी  दिलाई  है।
अमर शहीद क्रांतिकारियों की,
      याद   दिलों   में  समाई है।
शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की
      शहादत की बरसी आई है।

 माँ भारती के अमर सपूतों ने,
       देश सेवा को धर्म बनाया।
लाहौर  में  'साण्डर्स'  वध कर,
     'लालाजी' की मौत का बदला चुकाया।
सेंट्रल  असेंबली  में बम गिरा,
      इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया।

भारत माँ को आजाद करने की,
      सौगंध   इन्होंने  खायी  थी।
मरते   दम   तक   आजादी की,
         अलख इन्होंने जगाई थी।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।

 यह गीत गुनगुनाते हुए,
       साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
              इंकलाब जिंदाबाद
                 का नारा लगाते हुए
फाँसी के फंदों को वो चूम गए।

रोचक तथ्य-
१. १३ अप्रैल १९१९ को जलियाँवाला बाग कांड के समय भगत सिंह सिर्फ १२ वर्ष के थे। उन्होंने जलियाँवाला बाग के लाशों से भरे दृश्य को अपनी आँखों से देखा। वह खून से सनी मिट्टी उठाकर घर लाए और एक काँच की शीशी में भरकर रख दी जिसे देखकर वो अपने हृदय में आजाद भारत के सपने सजाते रहे।

२.  फाँसी से पहले भगत सिंह ने अंग्रेजों को पत्र लिखकर इच्छा जताई थी कि उन्हें युद्ध बंदी माना जाए और उन्हें फाँसी न दी जाए अपितु उनके सीने को गोलियों से छलनी कर दिया जाए किंतु उनकी यह अंतिम इच्छा पूरी न हो सकी।

३.  शिवराम राजगुरु की माँ ने जब उनसे शादी करने को कहा तो उनका उत्तर था घोड़ी नहीं फाँसी चढूँगा।

४.  इन अमर शहीदों को फाँसी के लिये अंग्रेज सरकार ने २४ मार्च १९३१ की तारीख तय की थी। लेकिन डरपोक अंग्रेज सरकार ने ११ घंटे पहले २३ मार्च की शाम ७ १/२ बजे ही फाँसी दे दी।

रचयिता
नीलम कौर,
सहायक अध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय शाहबाजपुर,
विकास खण्ड-सिकन्दराबाद,
जनपद-बुलंदशहर।

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