गुरू-आधार

शिक्षक जीवन जीने का आधार है।
करता वह सबका बेड़ा पार है।।

निर्देशों की चाह नहीं, हर इल्म से होता नाता है।
भव सागर से तर जाता, जो शिष्य गुरू का बन जाता है।।
जिसने जहाँ जन्म लिया, वहीं गढ़ा नार है।
फिर भी मानवता की खातिर, उसने अपनाया सारा संसार है।।
शिक्षक जीवन जीने का आधार है।
करता वह सबका बेड़ा  पार है।।

मात-पिता जैसा कर्तव्य-बोध करता जाता है।
पथ-प्रदर्शक कर, यूँ सुगमकर्ता कहलाता है।।
स्नेह और ममता जैसी लगती मीठी-मीठी मार है।
प्रिय शिष्य को पहनाता बाहों का वो हार है।।
शिक्षक जीवन जीने का आधार है।
करता वह सबका बेड़ा  पार है।।

सर्दी हो या हो वर्षांत, छुट्टी कभी न भाती है।
देश के कल्याण की खातिर, नित लिखता पाती है।।
सींच-सींच पौधे को अपेक्षा रखता फल डार है।
इसी की खातिर हर रोज लगाता 'कलम' धार है।।
शिक्षक जीवन जीने का आधार है।
करता वह सबका बेड़ा  पार है।।

जब भी आए देश में विपत्ति, जिम्मेदारी बढ़ जाती।
छात्रों के संग मानवों की भी जिम्मेदारी आती।।
इसीलिए कविवर कहते गुरू की महिमा अपरम्पार है।
संसार में और न दूजा मिलता कोई सार है।।
शिक्षक जीवन जीने का आधार है।
करता वह सबका बेड़ा  पार है।।
         
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरकातपुर,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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