नारी मन

नारी मन का अनुबंध है, प्रेम का प्रबंध है।
जीवन को परिभाषित करती एक निबंध है।।

नारी तू प्यारी है, ब्रह्माण्ड से भी भारी है।
जीवन की तू निर्माता है,
यादगार बचपन तुझसे ही आता है।
लक्ष्मण चरणों पर ही झुक जाते हैं,
विवेकानंद निवेदिता को बहन बनाते हैं।

भगवान भी मीरा के गुण गाते हैं,
राधा के होकर रह जाते हैं।

नमन करो उन माताओं जो शिवाजी, चन्द्रगुप्त की निर्माता है,
नारी कोई भोग नहीं श्रृद्धा से उसका नाता है।

रचयिता
डॉ0 ज्योति मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मिरशादपुर,
विकास खण्ड-बदलापुर,
जनपद-जौनपुर।

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