नववर्ष है आया

आज पुनः नववर्ष का आगाज हो गया।
 पर नवीन उत्साह कहीं पर खो गया।।
कैसी यह विचित्र घड़ी है,
विपदा जैसे सिर पर खड़ी है,
सब बैठे हैं घरों में अपने,
गहरी नींद में सो गए सपने,
कब निकलेंगे नीड़ से बाहर,
मारे हिलोरें सोच का सागर,
उत्सुक बाहर झांक रहा है,
पर मन ही मन काँप रहा है,
सबके मन में डर है समाया,
कैसा यह नववर्ष है आया,
कभी यह मुकद्दर जागेगा जो आज सो गया।
पर नवीन उत्साह कहीं पर खो गया।।
आज हर एक इंसान को है खतरा,
बेटी, बेटे, मां को है खतरा
खतरे में है दुनिया सारी,
खतरा ही है यह महामारी,
यह खतरा, भौतिकता लाई,
सीमा लांघ करी चतुराई,
पाप गगरी भर के छल की,
चिंता होती है अब कल की,
पहले क्यों यह विचार ना आया,
अपना किया ही आगे आया,
धरती में विनाश का कोई बीज हो गया।
और नवीन उत्साह कहीं पर खो गया।।
 जीवन भर आगे ही आगे,
लालच में अंधे हो भागे,
पर जब तुम पर आफत आई,
कोई दौलत काम ना आई,
सुनो जरा वह दुनिया वालों,
कर्मों पर अपनी नजरें डालो,
खेत जो चिड़िया चुग गई सारा,
तब पछताया दिल यह हमारा,
अंधकार जब छा जाएगा,
जग सारा फिर पछताएगा,
धरती के हालात पर आकाश रो गया।
आज पुनः नववर्ष का आगाज हो गया।।

रचयिता
पूनम गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय धनीपुर,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

Comments

  1. बहुत ही शानदार कविता। आपकी कलम को सलाम। आपकी कलाम को सलाम।

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