नव संवत्सर मंगलमय हो

शान्त सौम्य सुखकर दुखहर्ता हो।
शुभ मंगल हो नव संवत्सर।
शुभ प्रकाशित, उल्लसित हो।
कंटक व्याधि रहित हो नव संवत्सर।

नव वर्ष के प्रथम दिवस से ही।
मुन्था को मंगलकरण हो संवत्सर।
महामारी के ताण्डव को हर।
वरद हस्त सब मस्तक पर धर।
शुभ मंगलकारी हो नव संवत्सर।

नव संवत्सर की मधुर बेला में,
चहुँ दिशि मंगल ही मंगल हो।
मधु मास व मधु ऋतु में,
घर - घर में मंगल ही मंगल हो।

प्रमादी नाम संवत्सर आया।
राजा इस वर्ष  बुध हुए।
सोमदेव  मंत्री बने।
हर घर में मंगल ही मंगल हो।

राजा और मंत्री का यह उत्तम संयोग,
उल्लास और सुखमय से रहेंगे लोग।
व्यापार बढ़े कोष बढ़े खास।
जन - जन का होगा कल्याण।
जन - 2 की है यह आस।

सस्येश गुरु हुए अन्न, धन।
दुग्ध व रस खूब बढ़े।
 धर्म कर्म की वृद्धि होवे।
 पापाचार अनाचार ना बढ़े।

धान्येश भौम जी क्या कहें।
तेल, सरसों अनाज के मूल्य खूब बढ़े।
 मेघपति रवि, रवि फसलें खूब फलें।
वर्षा में हो कमी कुएँ तालाब सूखे मिलेंगे।

रसपति भी शनिदेव हैं,
करेंगे सबको निराश।
रोग दोष में वृद्धि होगी,
होगा दुखों का जाल।

अनावृष्टि हो खण्डवृष्टि हो।
शासन - प्रशासन के नेक कार्यों से।
जनता भी होगी संत्रस्त।
सुख - दुख दोनों होंगे सम,
ऐसा होगा नव संवत्सर।

माँ जगदम्बा दुर्गा तू ही
तू ही है रणचण्डी।
दुख निवारिणी, मंगलकरणी।
तू ही कालविनाशनी।

अरजू करूँ मैं माँ तुमसे,
सबके दुखों को हरदे।
जरा व्याधि दुख दरिद्र हर दे,
चहुँ दिशि मंगल ही मंगल कर दे।

रचयिता
माधव सिंह नेगी,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जैली,
विकास खण्ड-जखौली,
जनपद-रुद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।

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