नव संवत्सर का महत्व
किसी भी व्यक्ति और समाज के लिए उसके नववर्ष का विशेष महत्व होता है। नववर्ष मनाने का प्रचलन पूरे विश्व में है। एक जनवरी को पूरी पृथ्वी पर विपरीत वातावरण अपने चरम पर होता है, उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु अपने यौवन पर रहती है तो दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु त्राहि-त्राहि मचाती है। यदि हम केवल उत्तरी गोलार्द्ध की ही बात करें तो 1 जनवरी को रातें लम्बी और दिन छोटे होते हैं। एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका तीनों महाद्वीपों के उत्तरी भागों में तो रातें असाधारण लम्बी व दिन केवल नाममात्र के होते हैं। पतझड़ ऋतु समस्त पेड़ों को कान्तिहीन बना देती है। फलस्वरूप प्रकृति उदास एवं उत्साहविहीन दृष्टिगोचर होने लगती है।
दूसरी ओर
दूसरी ओर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर पूरी पृथ्वी पर वातवरण सम रहता है। न दिन लम्बे न रात छोटी, न दिन छोटे न रात लम्बी। न शीत ऋतु न ग्रीष्म ऋतु। मन में उत्साह की हिलोरें भरने वाली वसन्त ऋतु। पेड़ों पर मनभावन नई-नई कोपलें, खेतों में सरसों का वीरता का सन्देश देने वाला पीला रंग। चहुँओर उत्साह, उमंग, उल्लास व आनन्द भरने वाला वातावरण। यह अवधि प्राकृतिक रूप से भी अत्यधिक सौंदर्य को बिखेरने वाली होती है। पेड़-पौधों में कली और फल आने का दौर भी यही होता है, जिससे वातावरण में एक नया ही उल्लास रहता है जो मन-मस्तिष्क को पूरी तरह से आह्लादित कर देता है। यह है नव संवत्सर का महत्त्व। इसे हम विक्रम संवत भी कहते हैं। इसीलिए नववर्ष मनाने का सही समय 1 जनवरी नहीं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है।
भारत में नूतन वर्ष ईश्वर की कृपा से आप तथा आपके परिजनों हेतु सर्वरूपेण हितकारी एवं सुखदायक हो। कोरोना वायरस को नष्ट करते हुए सम्पूर्ण वसुन्धरा को नीरोग एवं सुख-शान्ति प्रदान करने वाला हो।
परन्तु नव संवत्सर कृपया एक दिन के लिए ही मना कर छोड़ मत दीजिए, इसे अपने जीवन में यथासम्भव समस्त कार्यों के लिए अपनाइए क्योंकि यह न केवल हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है अपितु कालगणना की विश्व की जितनी भी पद्धतियाँ हैं उनमें से सर्वाधिक वैज्ञानिक पद्धति है। कालगणना की विश्व में जितनी भी पद्धतियाँ हैं वे या तो केवल सूर्य पर आधारित हैं या चन्द्रमा पर आधारित हैं। अत: संवत्सर में चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष में गहरा सामञ्जस्य होता है। इसीलिए तो हमारे समस्त देवी-देवताओं के जन्मदिन, विवाह की वर्षगाँठ, मङ्गल कार्य, गृह-प्रवेश, निर्वाण दिवस एवं हमारे समस्त पर्व संवत्सर की तिथियों के अनुसार ही मनाये जाते हैं। फिर हम अपने जन्मदिवस आदि पाश्चात्य संस्कृति के ईस्वी सन् के दिनांक से क्यों मनाएँ?
अतः आइए इस पावन अवसर पर हम निश्चय करें कि हम अपने समस्त परिजनों-पूर्वजों के जन्मदिवस, विवाह की वर्षगाँठ इत्यादि संवत्सर की तिथि अनुसार ही मनाएँगे और अपने व्यक्तिगत जीवन से जुड़े प्रत्येक शुभ कार्य भी संवत्सर के पञ्चाङ्गानुसार ही सम्पादित करेंगे। इसीलिए अपने घर, कार्यालय आदि में संवत्सर का एक न एक पञ्चाङ्ग अवश्य टाँगेंगे।
राजेन्द्र सिंह,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय सिंहपुर हिम्मतपुर,
विकास खण्ड-बिजौली,
जनपद-अलीगढ़।

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