जल जीवन आधार

यही कली है, यही पुष्प है, यही तो है उपवन
मानव का आधार यही है, इसी में है जीवन।
जिससे सजे घर-बार हमारा और सजे आँगन
मानव का आधार यही है इसी में है जीवन।।

इसी में है ऑक्सिजन जिससे हम साँसे ले पाते हैं
दिनचर्या की सभी जरूरत हम पूरी कर पाते हैं।
शीतल हो तो बनता हिम और उष्ण बने अदहन
मानव का आधार यही है इसी में है जीवन।।

कभी वारि है, कभी नीर है कभी ये गंगाजल
पोखर, कुवाँ, सरोवर देते ये अमृत निर्मल।
पाप कटे इस जीवन के बस करने से आचमन
मानव का आधार यही है इसी में है जीवन।।

यही वो अमृत है जिसने इस दुनिया को है सँवारा,
मानव से लेकर भागीरथ के पुत्रों को उबारा।
इसे बचाओ प्रिय मित्रों वरना होगा क्रंदन
हाँ इसे बचाओ सब मिलकर कहता है रघुनंदन
मानव का आधार यही है, इसी में है जीवन।।

रचयिता
रघुनाथ द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चायल, 
विकास खण्ड-चायल,
जनपद-कौशाम्बी।

Comments

Total Pageviews