माँ

आँगन में तुलसी होती है, अंधियारे में ज्योति,
माँ से है अस्तित्व जगत का, सर्वोपरि माँ होती।

भार जन्म से ही कांधे पर, नन्हीं परी ये ढोती,
नारी बस तुम सीता रहना, उम्मीद सदा ही रहती।

पग - पग छल मक्कार खड़े हैं, ऊँची मूँछें ताने,
निश्छल एक मुस्कान देख कर, करते भद्दे ताने।

भूल जाते हैं हवस के अंधे, ये है जननी का रूप,
छाँव में दूध पिलाया जग को, भूखे सहती धूप।

सूरज थक कर सो जाता है, कर दो थोड़ी रात,
खुशियाँ बाँटू सबको, दिल से यही सताती बात।

बच्चे को आँचल से ढककर करवट से सोती माँ,
मेरा पेट भरा है कह, सब बाँट रोटी देती माँ।

चिड़िया भी घर के छप्पर में, लेती माँ से सीख,
छोड़ चले हैं सभी परिंदे, नहीं रहे हैं दीख।

भूल गए सब त्याग, धरा से बढ़कर कष्ट उठाया,
खुश है सुनकर बच्चों ने माँ का मान बढ़ाया।

रचयिता
नवीन कुमार,
सहायक अध्यापक,
माडल विद्यालय कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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