होली

होली के त्यौहार का प्रारंभ 

होलिका दहन से होता है। होलिका की अग्नि में अनेक वस्तुओं का दहन किया जाता है, जिनमें कुछ वस्तुएँ अत्यंत उपयोगी और कुछ अनुपयोगी (त्याज्य) भी होती हैं। होलिका दहन की प्रक्रिया से  पर्यावरण की शुद्धि भी अभीष्ट है। होली आनंद और मस्ती का पर्व है यह परम्परा अति प्राचीन है। ये उत्सव का पर्व है  इसकी सबसे विलक्षण विशेषता ये है कि ये हर जगह की लोकसंस्कृति पर आधारित होता है। वहाँ की लोक संस्कृति, लोक परम्पराओं की महक होती है। सब लोग जानते हैं इसकी सुदीर्घ परम्परा। हर संस्कृति का अपना अलग रंग होता है। लेकिन हमारे भोजपुरी में इसे मनाने का अलग रंग है। यद्यपि आज के आधुनिकरण ने इसके मिठास को हल्का कर दिया है। लोग भूलते जा रहे हैं फाग गीत और उलारा। डी जे के धुन पर मदिरा पान कर कीचड़ में कपड़े उतार कर नाचने लोटने और भद्गगी तक सीमित होकर रह गया है आनंद और मस्ती का ये पर्व। देवर भाभी का मजाक का पुट लिए संवाद और उलारा इसकी जान हैं। साली जीजा यहाँ तक भी कहा जाता है कि "फागुन में बाबा देवर लागे" सबकी अपनी अलग मस्ती होती है। एक समय था गाँवों में ये परम्पराएँ जीवन्त थीं लेकिन आज गाँवों से इस मस्ती और आनंद का पलायन चिंतनीय विषय है। फाग जो भजन से शुरू होकर उलारे तक चलता रहता है उसमें सबकी अलग मौलिकता होती है, जीवन्तता होती है। 

कुछ परम्पराओं का पलायित होना मानो मानव के हृदयहीन और जीवन्तता से दूर होने का परिचायक होता है। हम अपनी लोकसंस्कृति से विमुख हो आधुनिक तो कहलाने का भ्रम पाल सकते हैं लेकिन अपने पुरखों के इस आनंद और मस्ती की विरासत को निर्जीव करते आ रहे हैं। होली पर्व की एक विशेषता इसके ऋतु की होती है। ये ऋतु मस्ती का होता है। प्रायः प्रेम का आकर्षण अधिक होता है और ऐसे समय में रंग से सराबोर स्त्री और पुरुष आनंद और मस्ती में झूमते रहते हैं। 

इसमें अश्लीलता थोड़ी बहुत हो सकती है किन्तु फूहड़पन और भद्गगी के लिए कोई स्थान नही। आज जरूरत इस बात की है कि हमे आनंद और मस्ती के इस पर्व को गाँवों से पलायित होने से बचाना होगा। सुबह से शाम तक की इस अलौकिक मस्ती को जीना होगा। अगर परम्पराओं में टूटन होती रही तो हम मनुष्यता और संवेदनशीलता को ज्यादा दिन तक सहेज नही पाएँगे। हमें अपनी परम्पराओं में लौटना होगा, लोकसंस्कृति में जीना होगा, डी जे की जगह ढोलक पर फाग और उलारे की मस्ती के आनंद को महसूस करने का अभ्यस्त होना पड़ेगा। हमारे भोजपुरी लोकसंस्कृति की यह विलक्षण विशेषता है कि इसमें आनंद का हर रंग हर मौसम के साथ समाहित होता है।
   
लेखक
रवीन्द्र नाथ यादव,
सहायक अध्यापक,  
प्राथमिक विद्यालय कोडार उर्फ़ बघोर नवीन,
विकास क्षेत्र-गोला,
जनपद-गोरखपुर।

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