अपनी होली

आओ मिलकर दूर करें सब लालच स्वार्थ की बोली,
भले मिलें ना गले, मुबारक सबको दिल से होली।

वेद पुराणों में निहित जो समझें क्या है होली?
मैल मिटे बिना नहीं होगी सच्ची अपनी होली।

गागर सबकी प्रेम भरी हो बाँटें दोनों हाथ,
भले ना चेहरा पहचानो पर देना सबका साथ।

एक इबारत लिख जाओ मानव धर्म है श्रेष्ठ,
न ही अनुज यहाँ है कोई, न कोई किसी से जेष्ठ।

दान - दया ही धर्म ग्रंथ हैं देखो निश्छल मन,
वेश भूषा नहीं बाँट सके जिन्हें उनमें अपनापन।

धरा पवित्र थी इस भारत की ऋषियों का था वास,
मानव की ही रक्षा करना, उनका मंत्र था खास।

दूषित वातावरण शुद्धि का हवन है पावन होली,
भले मिलें ना गले, मुबारक सबको दिल से होली।

मौका है होली का मित्रों कुछ आहुति दे जाएँ,
अपने कष्टों के कारण की आहुति दे जाएँ।

बदलेगी जब नज़र ये अपनी सुंदर होगी दुनिया,
रक्त के छींटें कहीं ना होंगे खिलेंगी मन में कलियाँ।

भाषा, वेश नहीं कटुता का कारण कोई अटल,
त्योहारों के महत्व को समझें सौहार्द का एक ही हल।

ईद मनाओ गुरुपर्व या दीवाली या होली,
बिना प्रेम के खाली ही है हर एक अहम की झोली।

मिलकर द्वेष मिटाना होगा किया सबको बदहाल,
लाल, हरा या पीला, नीला प्रेम भरा हो गुलाल।

आओ वादा करें ये खुद से, निश्चल मन गले लगाएँगे,
सभी पर्व है प्रेम बाँटते, होली भी ऐसे मनाएँगे।

रचयिता
नवीन कुमार,
सहायक अध्यापक,
माडल विद्यालय कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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