रंग संवाद का

पिचकारी हो शिक्षक की
रंग उसमें संवाद का
भाव भरे हों शिक्षण के
जल उसमें उन्माद का।।

बन जाऊँ मैं यार तुम्हारा एक दिवस की होली में
घोलूँ मैं मिश्री के रंग अपनी हर एक बोली में
रंग रंगू सराबोर कर दूँ मैं सबको अपनी टोली में
ऐसे खेलूँ होली संग में कष्ट मिटे अवसाद का
भाव भरे हों शिक्षण के
और रंग उसमें संवाद का।

लाल रंगू, रंग दूँ मैं पीला पट अपने ही यार का।
भगवा रंग हो देशभक्ति का और कलर हो प्यार का।
हरा रंगू हरियाली का और उजाला अभिवाद का
भाव भरे हों शिक्षण के,
और रंग उसमें संवाद का।।

पिचकारी हो शिक्षक की
और रंग उसमें संवाद का
भाव भरे हों शिक्षण के
और जल उसमें उन्माद का।।

रचयिता
रघुनाथ द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय गुरौली, 
विकास खण्ड-चायल,
जनपद-कौशाम्बी।

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