कोरोना
कितनी अच्छी है हमारी संस्कृति सोचो ना,
इसे तुम कभी भूलो ना, फिर कहे को रोना।
हाथ मिलाना क्या हमारी संस्कृति है?
हाथों को जोड़ो ना, फिर काहे को रोना।
घर जब आओ, जूतों को दूर खोलो ना,
अपनाओ ऐसे संस्कार तो काहे को रोना।
संस्कार थे बुजुर्गों के, पैरों को बाहर धोना,
तब घर में प्रवेश होना, फिर काहे को रोना।
रोज तुम योग व्यायाम अपनाकर देखो ना,
पास न फटकेगा कुछ भी, तो काहे को रोना।
शाकाहारी बनो, माँस मछली को छोड़ो ना,
जीव जंतु पर करोगे दया, तो काहे को रोना।
रहो थोड़ा सावधान, अफवाहों को छोड़ो ना,
छोड़ो भीड़भाड़ में जाना तो काहे को रोना।
छोड़ पाश्चातय संस्कृति अपनी अपनाओ ना
आज अमेरिका भी हमारी अपना रहा है तो काहे कोरोना।
रचयिता
रामेश्वरी लिंगवाल,
सहायक अध्यापक,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय ज्ञानसू (नवीन),
विकास खण्ड-भटवाड़ी,
जनपद-उत्तरकाशी,
उत्तराखण्ड।
इसे तुम कभी भूलो ना, फिर कहे को रोना।
हाथ मिलाना क्या हमारी संस्कृति है?
हाथों को जोड़ो ना, फिर काहे को रोना।
घर जब आओ, जूतों को दूर खोलो ना,
अपनाओ ऐसे संस्कार तो काहे को रोना।
संस्कार थे बुजुर्गों के, पैरों को बाहर धोना,
तब घर में प्रवेश होना, फिर काहे को रोना।
रोज तुम योग व्यायाम अपनाकर देखो ना,
पास न फटकेगा कुछ भी, तो काहे को रोना।
शाकाहारी बनो, माँस मछली को छोड़ो ना,
जीव जंतु पर करोगे दया, तो काहे को रोना।
रहो थोड़ा सावधान, अफवाहों को छोड़ो ना,
छोड़ो भीड़भाड़ में जाना तो काहे को रोना।
छोड़ पाश्चातय संस्कृति अपनी अपनाओ ना
आज अमेरिका भी हमारी अपना रहा है तो काहे कोरोना।
रचयिता
रामेश्वरी लिंगवाल,
सहायक अध्यापक,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय ज्ञानसू (नवीन),
विकास खण्ड-भटवाड़ी,
जनपद-उत्तरकाशी,
उत्तराखण्ड।

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