मिट्टी का रंग

जब चढ़ता है न मेरी मिट्टी का रंग
तब और कोई रंग मुझे चढ़ता नहीं।
पड़ जाते हैं रंग फीके सारे मेरे
लहू को रंग कोई अब पकड़ता नहीं।।

1) जो रहता हूँ न सरहद पर
मटीले रंग बिन अब मन लगता नहीं।
कितना पहन लूँ हरा गुलाबी
तिरंगे के बिना कोई रंग जचदा नहीं।।

2) जो लड़ते हो न गलियारों में
ऐसे लाल हरे का मोल नहीं।
गर देश के काम न आये तो
ऐसा रंग मुझे जकड़ता नहीं।।

3) रंगों के त्योहारों पर
जो तरह-तरह के मिलकर के।
हर धर्म झाँकता रंगों में
यूँ कली सुहानी खिलकर के।।

4) शायद इन रंगों के भीतर
भेदभाव मुझे दिखता नहीं।
मेरा लहू जो हिन्दुस्तानी है
मेरे आगे दुश्मन टिकता नहीं।
क्योंकि मेरे खून को रंग कोई पकड़ता नहीं।।

रचयिता
आयुषी अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय शेखूपुर खास,
विकास खण्ड-कुन्दरकी,
जनपद-मुरादाबाद।

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