कशमकश

आज मन में फिर एक सवाल है,
क्या वाकई ईश्वर है कहीं या नहीं?
गर है तो हर जगह ये बेचैनी क्यों है,
वो परमपिता है तो सँभाले अपनी दुनिया।
सबकी हालत अनाथों सी क्यूँ है,
क्या इस त्रासदी का कोई अंत नहीं?
क्या ये बेबसी उस तक पहुँचती नहीं?
सब तरफ खामोशी है सन्नाटा है,
किसी सवाल का कोई जवाब आता नहीं।
कोई तो दिखाए रास्ता कोई तो सँभाले,
हर तरफ इतनी निराशा फैली क्यूँ है?
टीवी, अखबार, मोबाइल पर बस बहस है,
इस बहस का कोई नतीजा निकलता क्यों नहीं।

तभी मन का एक कोना होता है रोशन,
अरे नादां यूँ बेसब्र ना हो थोडा तो सब्र कर।
कुछ तो ठहर, ये मंजर भी बदलेगा,
वो नावाकिफ नहीं तेरी मजबूरी से
बस कर रहा कुछ अच्छा इंतजाम है।
ये अंधेरी रात ढलेगी जल्द ही ,
खुशियों का सूरज निकलने को है.
तब तक तू इंसानियत का दिया जलाये रख,
ये इम्तहान है तेरी इंसानियत का,
तुझे पास होना है बस इतना समझ.
अब कुछ सुकून सा है दिल को,
अब कुछ रास्ता रोशन सा है,
थोडी खुशियों लुटाऊँगा उन पर
जो जिंदगी से बेजार हो रहे,
हाँ मैं खुशियाँ लुटाऊँगा उन पर
जो जिंदगी से निराश हो रहे।

रचयिता
नीलम गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
मॉ. इ. मा. कम्पोजिट विद्यालय गोयना,
विकास खण्ड-हापुड़,
जनपद-हापुड़।

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