शत् शत् नमन शहीदों को

शत् शत् नमन शहीदों को
आजादी के जाबांज वीरों को।

हँसते-हँसते चढ़ गये जो फाँसी के  फंँदे पर
हर किसी की जुबां पे नाम हो गया उनका अमर।

सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु  भारत  माँ  के लाडले
क्रांतिवीर शहीद हुए आज़ादी के रखवाले।

उद्देश्य कानून बनाने का था
क्रान्ति  बीज जनता में पनपाने का था।

क्रांति बीज अंकुरित से पहले ही
 कर दिया जा रहा था समाप्त।

फिर 8 अप्रैल 1929 को घटना घटी बमकाण्ड की
योजना थी ये भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की।

एसेम्बली में बम फेंका था, पहुँची न किसी को हानि
स्वेच्छा से भगत सिंह और बटुकेश्वर ने गिरफ्तारी की ठानी।

वहाँ इन्होंने परचे बाँटे, विस्फोट सुनाने बहरोंं को
चला मुकदमा लाहौर षड़यंत्र का, 7अक्टूबर 1929 को।

खून खौल गया था सबका, जब इनको सजा सुनाई थी
23 मार्च 1931 का दिन था, जब इनको फाँसी लगाई थी।

नारा दिया इन्कलाब का भारत माँ के वीर सपूतों ने
घटना महत्वपूर्ण दर्ज हुई भारत के इतिहास में।

बात जब -जब आजादी की होगी
इन शहीदों की चर्चा हर जुबां पर होगी।
शत् शत् नमन शहीदों को।
आजादी के वीरों को।

रचयिता
सरिता भटृ,
प्रधानाध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 फलई,
विकास खण्ड-अगस्त्यमुनि,
जनपद-रुद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।


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