प्रकृति का नारी रूप

तुम श्रद्धा, तुम स्निग्धा
     रूपसी तुम अवतार हो
तुम वात्सल्यमयी जननी
     तुम हृदय झंकार हो।
नील हरित परिधान में
      तुममें यह जीवन बसा,
दे दिया सब कुछ सृजक ने
        शेष क्या सुन्दर बचा,
दर्श देती यूँ सहज
         तुम स्वयं उपकार हो,
तुम वात्सल्यमयी जननी
          तुम हृदय झंकार हो।
मैं बहुत हूँ दीन हीन
            और स्वार्थ से पल्लवित
जग के सारे दुर्गुणों से
              बंध व करुणा कलित
तुम सुनयना, तुम सुमुग्धा
             तुम रत्न का अम्बार हो
तुम वात्सल्यमयी जननी
              तुम हृदय झंकार हो।

रचयिता
श्रेया द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवीगंज,
विकास खण्ड-कड़ा,
जनपद-कौशाम्बी।

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