आफत भरी किसानी
कितनी आफत से भरा हुआ,
सर्वस्व दाँव पर लगा हुआ।
गाथा है यही किसानी की,
आँधी-तूफां औ-- चूहा जी।
एक बार गिरा तो खड़ा हुआ,
टेढ़े - मेढ़े ही बड़ा हुआ।
गर बाढ़-नीर से भरा हुआ,
समझो सब कुछ तब सड़ा हुआ।
जब-जब सूखा पड़ जाता है,
जल-स्तर, कूप, नहर, बिजली,
सब कुछ धोखा दे जाता है।
यह इंद्र-देव का कोप देख,
सिर-माथे हाथ रखे कृषक भाई,
बेबस खुदा-खुदा चिल्लाता है।
गर आफत से बच जाता है,
खेतिहर के घर आ जाता है।
जब बारी आती विक्रय की,
सब कुछ सस्ता हो जाता है।
औने - पौने के दामों में,
व्यापारी लेके सब जाता है।
अब छोड़ किसानी खड़ा हुआ,
कितनी आफत से भरा हुआ,
सर्वस्व दाँव पर लगा हुआ।।
जय हिन्द हाय कृषक वृन्द
रचयिता
विजय मेहंदी,
सहायक अध्यापक,
KPS(E.M.School)Shudanipur, Madiyahu,
जनपद-जौनपुर।
सर्वस्व दाँव पर लगा हुआ।
गाथा है यही किसानी की,
आँधी-तूफां औ-- चूहा जी।
एक बार गिरा तो खड़ा हुआ,
टेढ़े - मेढ़े ही बड़ा हुआ।
गर बाढ़-नीर से भरा हुआ,
समझो सब कुछ तब सड़ा हुआ।
जब-जब सूखा पड़ जाता है,
जल-स्तर, कूप, नहर, बिजली,
सब कुछ धोखा दे जाता है।
यह इंद्र-देव का कोप देख,
सिर-माथे हाथ रखे कृषक भाई,
बेबस खुदा-खुदा चिल्लाता है।
गर आफत से बच जाता है,
खेतिहर के घर आ जाता है।
जब बारी आती विक्रय की,
सब कुछ सस्ता हो जाता है।
औने - पौने के दामों में,
व्यापारी लेके सब जाता है।
अब छोड़ किसानी खड़ा हुआ,
कितनी आफत से भरा हुआ,
सर्वस्व दाँव पर लगा हुआ।।
जय हिन्द हाय कृषक वृन्द
रचयिता
विजय मेहंदी,
सहायक अध्यापक,
KPS(E.M.School)Shudanipur, Madiyahu,
जनपद-जौनपुर।

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