जल की पीड़ा
था मैं कितना निर्मल पावन,
जलीय जीव सब मेरे आँगन,
आँगन तुम ही बचा लो रे
ओ मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
जलचर मुझमें डुबकी लगाते,
नदियों, गधेरों में जीवन बिताते,
प्यासे की मैं प्यास बुझाता,
खलिहानों को अमृत पिलाता,
मेरे अमृत को विष न बनाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
रखा था मैंने तुमको स्वस्थ,
कर डाला तुमने मुझको पस्त,
साबुन से धोकर तन और कपड़े,
गंदी नाली बोतल और डब्बे,
घर का कचरा मुझमें न मिलाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
हाय-हाय मेरा दम है घुटा,
जीवों पर संकट आन पड़ा,
मछली, मेंढक हैं तड़प रहे,
जीने को देखो तरस रहे,
जीवों पर दया दिखाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे,
अब तुम भी नहीं बच पाओगे,
रस मेरा ऐसा पी पी कर,
तुम भी रोगी बन जाओगे,
थोड़ा तो कर्ज उतारो रे,
गंगा कब तक मैला ढोये।
तुम कुछ तो फर्ज निभा लो रे,
अपना जीवन भी बचा लो रे
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
रचयिता
ममता मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय हरमनी मल्ली,
संकुल-हरमनी,
विकास खण्ड-नारायणबगड़,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।
जलीय जीव सब मेरे आँगन,
आँगन तुम ही बचा लो रे
ओ मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
जलचर मुझमें डुबकी लगाते,
नदियों, गधेरों में जीवन बिताते,
प्यासे की मैं प्यास बुझाता,
खलिहानों को अमृत पिलाता,
मेरे अमृत को विष न बनाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
रखा था मैंने तुमको स्वस्थ,
कर डाला तुमने मुझको पस्त,
साबुन से धोकर तन और कपड़े,
गंदी नाली बोतल और डब्बे,
घर का कचरा मुझमें न मिलाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
हाय-हाय मेरा दम है घुटा,
जीवों पर संकट आन पड़ा,
मछली, मेंढक हैं तड़प रहे,
जीने को देखो तरस रहे,
जीवों पर दया दिखाओ रे,
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे,
अब तुम भी नहीं बच पाओगे,
रस मेरा ऐसा पी पी कर,
तुम भी रोगी बन जाओगे,
थोड़ा तो कर्ज उतारो रे,
गंगा कब तक मैला ढोये।
तुम कुछ तो फर्ज निभा लो रे,
अपना जीवन भी बचा लो रे
मेरा बिगड़ा रूप सँवारो रे।
रचयिता
ममता मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय हरमनी मल्ली,
संकुल-हरमनी,
विकास खण्ड-नारायणबगड़,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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