हाँ गौरैया

जब वो आती थी घर आँगन महक जाता था,
देख उसे अपने आँगन में हर मन चहक जाता था।
दिन निकलते ही इंतजार करते थे उसके आने का,
टोकरी के नीचे रोटी रख उस गौरैया को बहलाने का।
देख रोटी जब वो बेखौफ उतरती थी आँगन में,
तब रंगी जाती थी वो रंगों के सावन में।
जब रंगी गौरैया यहाँ-वहाँ उड़ती थी,
तब उसकी यादें डाल-डाल से जुड़ती थीं।
फिर सुबह-सुबह की किरणों के संग,
रंगीन गौरैया खूब तमाशा दिखलाती थी।
हम भी खुश हो जाते थे वह मेरी है वह मेरी है,
वह भी अपने रंगे पंखों पर इठलाती थी।
कभी खिड़की पर अपनी चोंच से कुछ बनाती थी,
 कभी आईने में खुद को देख इतराती थी।
अच्छे लगते थे उसके सब खेल तमाशे,
हर अदा उसकी हमको लुभाती थी।
 हाँ गौरैया,
तुम्हारे जाने से बचपन छूट सा गया है,
 तुम बिन मेरा घर आँगन रूठ सा गया है।
 फिर से सुना दो अपनी चीं चीं के आहंग,
 फिर से दिखा दो हमारे बचपन से रंगे तुम्हारे पंखों के रंग।
हाँ गौरैया,
आ जाओ फिर से चहका दो मेरे घर आँगन को,
खुशियों से भर जाओ फिर से मेरे दामन को।

रचयिता
अनुराधा दोहरे,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय नगरिया बुजुर्ग,
विकास खण्ड-महेवा,
जनपद-इटावा।

Comments

Total Pageviews