स्त्री की परिभाषा

क्या जानते भी हो तुम
स्त्री की परिभाषा।
अपना स्वार्थ पूरा करने की
हरदम रखते हो अभिलाषा।।

1) शिखर पर चढ़ी है
मार्ग में कभी न रुकी है।
फिर भी क्यों बेड़ियों में
जकड़ने की करते हो आशा।।

2) पारदर्शी पानी सी बनी है
अग्नि बनने से भी न रुकी है।
फिर भी क्यों उसे
धूमिल करने की रचते हो पाशा।।

3) माँ बनके हरदम लड़ी है
पत्नी बन वो तेरा साया बनी है।
फिर भी क्यों चहारदीवारियों में
दफनाने का बुनते हो खाका।।

4) जब तक निर्भया भय में रहेगी
जब तक बस उसकी चुप्पी कहेगी।
जब तक वो हँसी सिहरती रहेगी
जब जब वो आत्मा रोती रहेगी।।
तब तक ये परिभाषा अधूरी रहेगी।
लेकिन याद रखना
वो ये सब हरदम न सहेगी।।
हरदम न सहेगी।।

रचयिता
आयुषी अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय शेखूपुर खास,
विकास खण्ड-कुन्दरकी,
जनपद-मुरादाबाद।

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