मेरा अस्तित्व स्वीकार करो

काश विभीषण को अपनों से सम्मान मिला होता।
सोने की लंका न जलती, न कोहराम मचा होता।।
जरुरत है क्यों आन पड़ी महिला को ही सशक्त करने की।
किसने शक्ति है क्षीण करी? पहचान करो उस दोषी की।।
वह तो खुद जगजननी है, उसकी शक्ति की क्या बात करें।
आओ उस शक्ति स्वरूपा को, सब मिलकर के सत्कार करें।।
जिसके कारण हम दुनिया में जिसने चलना सिखलाया है।
क्यों आज समाज ने फिर उसको
दया का पात्र बनाया है।।
हैं कौन दया करने वाले आओ उनकी हम बात करें।
कमजोर बनाया है जिसने उस समाज का बहिष्कार करें।।
हैं जिस समाज के दो पहलू
मैं उस समाज का हिस्सा हूँ।
अधिकार दिया जब ईश्वर ने
तो फिर कैसा किस्सा है।।
अपनों के बीच रहते हुए
अपनत्व की हकदार नहीं।
है समाज की ये खामी
जिसमें विशेष सुधार नहीं।।
नारी अभिव्यक्ति स्वीकार करें।
पहले अहम को दरकिनार करें।।
कमजोर नहीं थी सतयुग से।
उसे कलयुगियों ने तोड़ा है।।
थोड़ा सा ठहर करके सोचो।
क्या तुमने उसको जोड़ा है?
अब तक अपमान सहा उसने।
कुछ तुम अपमान का घूँट पियो।।
सब समझ आ जाएगा
न फिर न्यायाधीश बनो।।
ईश्वर ने अनमोल रची रचना।
उसको खिलौना समझ लिया।।
मन चाहा तब उससे खेला।
फिर तोड़ खिलौना फेंक दिया।।
जो किसी उपवन का पौधा थी।
वो उपवन बनने आयी है।।
यदि पौध उखाड़ फेंकोगे तुम।
फिर उपवन कैसे चहकेगा?
जिस मंदिर की कल्पना की तुमने
वो मंदिर कैसे महकेगा?
ज्ञानी होकर के न अज्ञानता की भूल करो।
अपने अस्तित्व के साथ ही उसका अस्तित्व स्वीकार करो।।
मत घोंट गला कोख में उसका।
न रिश्तों का अब खून करो।।
किस क्षेत्र में न नारी ने।
अपना परचम लहराया है।।
यही याद कराने फिर,
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस आया है।।

रचयिता
सुमन पांडेय,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरी मनौटी,
शिक्षा क्षेत्र -खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

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