कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम
जल-संकट की इस बेला में,
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम।
जल का अतिशय दोहन कर,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
अपनी जीवनशैली में
जल दोहन कर,
जल की सीमाओं को हम
सब तोड़ चले।
ऋषि, मुनि, अधिकारी, शिक्षाधिकारी हों या धर्माचारी,
सब अपने-अपने दायित्वों से मुख मोड़ चले।।
जल संकट की इस बेला में,
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम।
जल का अतिशय दोहन कर,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
पेड़-पौधों को काट-काट कर,
पर्यावरण प्रदूषित करते जहाँ।
इस कमर तोड़ जल संकट में
जल अपव्यय करते यहाँ-वहाँ।।
विषाक्त जल के पान से मानव शरीर भी टूट रहे।
बूँद-बूँद जल की चाहत में,
चूजे भी अब अपनी माँ से छूट रहे।।
हम वृक्षों का चीरहरण कर
जैसे भाई को भाई ही अवसर पाकर लूट रहे।।
जल संकट की इस बेला में।
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम
जल का अतिशय दोहन कर
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
कैसे अस्मिता बचाएँ हम,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
जो जल संचय को आत्मसात कर चले,
वो दर-दर ठुकराये जाते हैं।।
जल संकट की आवाज़ के सातत्य अबोध से,
हम अपने बच्चों के कल को मिटाये जाते हैं।।
नदी, ताल, तलय्या और पौधों का संवर्धन कर,
आघात-घात सब सह
इसका प्रतिवाद न कर।
संघर्षों के पथ पर चल बूँद-बूँद जल बचाएँ हम,
संकल्पित हों हम सभी यहाँ खुद अपना जीवन आप बचाएँ हम।
जल संकट की इस बेला में,
कैसे हृदय की वेदना सुनायें हम।
जल का अतिशय दोहन कर
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
रचयिता
रणविजय निषाद(शिक्षक),
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्थुवा,
विकास खण्ड-कड़ा,
जनपद-कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)।
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम।
जल का अतिशय दोहन कर,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
अपनी जीवनशैली में
जल दोहन कर,
जल की सीमाओं को हम
सब तोड़ चले।
ऋषि, मुनि, अधिकारी, शिक्षाधिकारी हों या धर्माचारी,
सब अपने-अपने दायित्वों से मुख मोड़ चले।।
जल संकट की इस बेला में,
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम।
जल का अतिशय दोहन कर,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
पेड़-पौधों को काट-काट कर,
पर्यावरण प्रदूषित करते जहाँ।
इस कमर तोड़ जल संकट में
जल अपव्यय करते यहाँ-वहाँ।।
विषाक्त जल के पान से मानव शरीर भी टूट रहे।
बूँद-बूँद जल की चाहत में,
चूजे भी अब अपनी माँ से छूट रहे।।
हम वृक्षों का चीरहरण कर
जैसे भाई को भाई ही अवसर पाकर लूट रहे।।
जल संकट की इस बेला में।
कैसे हृदय की वेदना सुनाएँ हम
जल का अतिशय दोहन कर
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
कैसे अस्मिता बचाएँ हम,
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
जो जल संचय को आत्मसात कर चले,
वो दर-दर ठुकराये जाते हैं।।
जल संकट की आवाज़ के सातत्य अबोध से,
हम अपने बच्चों के कल को मिटाये जाते हैं।।
नदी, ताल, तलय्या और पौधों का संवर्धन कर,
आघात-घात सब सह
इसका प्रतिवाद न कर।
संघर्षों के पथ पर चल बूँद-बूँद जल बचाएँ हम,
संकल्पित हों हम सभी यहाँ खुद अपना जीवन आप बचाएँ हम।
जल संकट की इस बेला में,
कैसे हृदय की वेदना सुनायें हम।
जल का अतिशय दोहन कर
कैसे खुशी के पर्व मनाएँ हम।।
रचयिता
रणविजय निषाद(शिक्षक),
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्थुवा,
विकास खण्ड-कड़ा,
जनपद-कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)।

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