22 मार्च जनता कर्फ्यू

वक़्त का छा गया कैसा ये क़हर है
ज़र्रे-ज़र्रे में मानो घुल गया ज़हर है।

सवाल है सभी की जिंदगी का
रास्ता अपनाओ खुद की बन्दगी का।

मान लो बात सरकार की
छोड़ो सारी जिद्द तक़रार की।

नहीं बात ये राजनीति की है
ये तो बचने-बचाने की नीति की है।

विश्व में पड़ी है वायरस कोरोना की मार
अपना वक़्त अपनों संग घर पर ही गुजार।

पृथ्वी पर किये लाखों अत्याचार
निर्दोष पशुओं पर भी तो किया वार।

हे मानव न बन दानव
बात इतनी सी मान, बन जा अब इन्सान।

विद्यालयों और मन्दिरों के भी बन्द द्वार हैं
आज चिकित्सालय ही बने चार धाम और हरिद्वार हैं।
 
सबसे अधिक सुरक्षित अपना ही घर है
भगवान बने पुलिसकर्मी, वैज्ञानिक, डॉक्टर हैं।

गर अपनों से लगाव है
समझ ले जानकारी ही बचाव है।
 
धोवें बार-बार साबुन से हाथ
कीजे एक मीटर दूरी से बात।

न मिलाओ हाथ, करो हाथ जोड़ प्रणाम
स्वसंस्कृति अपनाओ न बनो गुलाम।
 
सैनिटाइजर का कीजिए उपयोग
ढँके हाथ-मुँह, खाँसी-जुखाम का जो हो रोग।
 
बुखार, सिरदर्द ज्यादा बढ़ जाए
तब तुरन्त डॉक्टर को दिखाएँ।

डरने की नहीं कोई बात
अपना लो कुछ दिन एकांत।

फिर न होगा कोरोना और न ही होगा किसी का रोना
लड़कर इस महामारी से भारत को ही है विश्व गुरु होना।
 
रचयिता 
मोनिका रावत मगरूर,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय पैठाणी,
विकास खण्ड-थलिसैण, 
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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