प्रकृति से है सीखना
आओ सीखें माटी से, जीवन को संजोकर रखना।
सीखें हम चिड़ियों से, भोर पहर में उठना।।
प्रकृति से सीखें हम, हरपल देते रहना।
चन्दा, सूरज से हम सीखें, समय का पालन करना।।
तारों से अंधेरे में भी, सदा प्रकाशित रहना।
चींटी से अनुशासन व दिन रात परिश्रम करना।।
सदा मुस्कुराते रहना, सीखें हम फूलों से।
धर्म सहिष्णु बनना भी, सीखें हम फूलों से।।
सुख दुख में समभाव रहना, सीखें हम सागर से।
जीवन को विशाल बनाना सीखें, हम पर्वत से।।
पेड़ पौधों से सीखें हम, दूसरों के काम आना।
पतझड़ से सीखें हम, मोह त्यागते रहना।।
नदियों से हम सीखें, सदा ही चलते रहना ।
मौसम से हम सीखें, है कैसे अनुकूल बनना।।
ऋतु बसंत से सीखें, जीवन को सजाते रहना।
बच्चों से हम सीखें, मन को निर्मल करना।।
सबसे मीठा बोलना सीखें, हम कोयल से।
सामूहिक जीवन जीना, सीखें हम भेड़ों से।।
मधुमक्खी से सीखें, कुशल प्रबंधन करना।
सीखें हम पृथ्वी से, कभी धैर्य न खोना।।
कितना कुछ सिखलाती, है प्रकृति हमें जीवन में।
यह बात है मन में आयी, जो फैलाए जनमानस में।।
रचयिता
सुमन पांडेय,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरी मनौटी,
शिक्षा क्षेत्र -खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।
सीखें हम चिड़ियों से, भोर पहर में उठना।।
प्रकृति से सीखें हम, हरपल देते रहना।
चन्दा, सूरज से हम सीखें, समय का पालन करना।।
तारों से अंधेरे में भी, सदा प्रकाशित रहना।
चींटी से अनुशासन व दिन रात परिश्रम करना।।
सदा मुस्कुराते रहना, सीखें हम फूलों से।
धर्म सहिष्णु बनना भी, सीखें हम फूलों से।।
सुख दुख में समभाव रहना, सीखें हम सागर से।
जीवन को विशाल बनाना सीखें, हम पर्वत से।।
पेड़ पौधों से सीखें हम, दूसरों के काम आना।
पतझड़ से सीखें हम, मोह त्यागते रहना।।
नदियों से हम सीखें, सदा ही चलते रहना ।
मौसम से हम सीखें, है कैसे अनुकूल बनना।।
ऋतु बसंत से सीखें, जीवन को सजाते रहना।
बच्चों से हम सीखें, मन को निर्मल करना।।
सबसे मीठा बोलना सीखें, हम कोयल से।
सामूहिक जीवन जीना, सीखें हम भेड़ों से।।
मधुमक्खी से सीखें, कुशल प्रबंधन करना।
सीखें हम पृथ्वी से, कभी धैर्य न खोना।।
कितना कुछ सिखलाती, है प्रकृति हमें जीवन में।
यह बात है मन में आयी, जो फैलाए जनमानस में।।
रचयिता
सुमन पांडेय,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरी मनौटी,
शिक्षा क्षेत्र -खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

सच में, बहुत सुन्दर।
ReplyDeleteसतीशचन्द्र"कौशिक"
Thank you sir
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