आदर्श पुरुष विवेकानंद

इतिहास साक्षी है पुनीत,
ऐसा मनस्वी न भूतल पर।
श्रेष्ठ शिरोमणि बने थे वो,
घर त्याग सच्चाई अपनाकर।।

आचरण नियम संयम अपना,
थी दिव्य दृष्टि दर्पण समान।
चिंतन मानवता का हरपल,
थे ज्ञान योग से भरे निडर।।

मन पर संयम था अंतःकरण,
शुद्ध बहुत ही था निश्छल।
प्रेरित करने को युवा चुम्बकीय,
स्वर गूँजे थे इधर-उधर।।

कहा उठो, जगो आगे बढ़,
वरण करो स्वर्णिम अभीष्ट।
पूरा न हो जब तक सुस्वप्न,
करो कर्म छोड़ सारी फिकर।।

खोज रही भारत माता,
उस विजयघोष उन्नायक को।
गए विश्व धर्म सम्मेलन में,
जो संभाषण से अलंकृत कर।।

श्रद्धा सुमन है चरण वंदन,
उस अतुल्य ज्ञान पुरोधा को
सिद्ध विवेकानंद बने नर से,
नारायण था तप का असर।।

रचयिता
श्रीमती नैमिष शर्मा,
सहायक अध्यापक,
परिषदीय संविलियित पूर्व माध्यमिक विद्यालय तेहरा,
विकास खंड-मथुरा,
जिला-मथुरा।
उत्तर प्रदेश।

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