नमन तुम्हें हे! विवेकानंद

नमन तुम्हें सौ बार नमन, करते हैं भारत के जन-जन।
धरती का कण-कण बोल रहा, जय हो युग पुरूष विवेकानन्द।

जैसे प्रकाशमय करती हैं, सूरज की किरणें दिशाओं को।
वैसे प्रकाशमय तुमने किया, मन मानव की मालाओं को।

अपने निज ज्ञान की ज्योति पुँज, सारे जग में फैला डाला।
भारत की गरिमा का गौरव, सब दुनिया को दिखला डाला।

तुम ओजपूर्ण और ज्ञानपूर्ण, मन में संयम और योगपूर्ण।
तुम थे पूर्ण पुरूष किये यहाँ, सत्य ज्ञान के कार्य पूर्ण।

ये वसुंधरा फिर बुला रही, आकर भर दो इसका आँगन।
फिर से ला दो यहाँ संस्कार, निर्मल हो जाएँ सबके मन।

धरती नभ तुमको बुला रहे, कर रहीं दिशाएँ अभिनंदन।
धरती का कण-कण बोल रहा, जय हो युग पुरूष विवेकानन्द।

नमन तुम्हें सौ बार नमन, करते हैं भारत के जन-जन।
धरती का कण-कण बोल रहा, जय हो युग पुरूष विवेकानन्द।

रचयिता 
महेंद्र सिंह,
अनुदेशक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय कुम्भीपुर,
विकास खण्ड-हथगाम,
जनपद-फतेहपुर।
मो०-+919559197350

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