पर्यावरण का रूदन

हाँ, मैं पर्यावरण हूँ। वही पर्यावरण जिसका जन्मदिन आज 5 जून को पूरा विश्व मना रहा है। 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 5 जून को मेरा जन्मदिवस मनाने का फैसला लिया था। 

हर वर्ष आप लोग इस दिन को पूरे दिखावे व धूमधाम से मनाते हो। पौधे लगाना, रैली निकालना, बड़ी-बड़ी मीटिंग करना, सोशल मीडिया पर पर्यावरण संरक्षण के बढ़िया-बढ़िया लेख, चित्र व मैसेज अपने फोटो के साथ डालना आदि-आदि दुनिया भर का दिखावा व आडम्बर। लेकिन क्या कभी वास्तव में आप मुझे संरक्षित करने हेतु संजीदा हुए हो??

नहीं ना, बस यही मेरे लिए दुःखद है। मेरे अस्तित्व से ही आपका अस्तित्व हुआ। आपने अपने मस्तिष्क का प्रयोग कर बहुत तरक्की की। अपने ऐशो-आराम की नई-नई अद्भुत चीजें बना डालीं। इस निर्माण में आप इतना तल्लीन हुए कि मुझे पूरी तरह से भूल गए। आपकी इस आराम पसंदगी ने मुझे घायल करना शुरू किया। मेरे अस्तित्व को ही गड़बड़ा दिया। मेरी ओज़ोन परत में छेद करना शुरू कर दिया।

मैं क्रोध ना करता तो क्या करता। मैंने भी अपने दाँत दिखाने शुरू किये। कभी बाढ़ के रूप में कभी सूखे के रूप में, कभी अत्यधिक गर्मी फैलाकर, कभी अत्यधिक सर्दी फैलाकर। कभी भूकंप लाकर, कभी चक्रवात लाकर। 

किन्तु आप इतने महान हो कि मेरे क्रोध को समझ ही नहीं पा रहे। निरंतर मेरे पेड़ों को, मेरे जंगलों को काट रहे हो। मेरे पेयजल को बर्बाद कर रहे हो। प्लास्टिक जैसी जहरीली वस्तु से आपने मेरी साँसे रोक दी हैं। आपके वाहनों, AC तथा फैक्टरियों से निकलने वाला जहरीला धुआँ व गैसें मेरी हवा को जहरीला बना रही हैं। ज्यादा फसल व पैदावार के लालच में आपके द्वारा प्रयुक्त कीटनाशक व कैमिकल्स ने मेरी मिट्टी को विषैला बना दिया है। 

मेरा दम लगातार घुटता जा रहा है। मेरे शरीर में कैंसर फ़ैल गया है। आपने जो मुझे दिया, वो मैं आपको ट्रांसफर कर चुका हूँ। वही कैंसर अब आप सबके शरीर में फ़ैल रहा है। हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर, एलर्जी, खुजली, माइग्रेन और भी सत्तर तरह की बीमारियाँ मैं आपको दे चुका हूँ। 

धरती का तापमान इस वर्ष 50 डिग्री सेल्सियस तक तो पहुँच गया। अगले 2 सालों में यह 55 डिग्री तक पहुँच जायेगा। हर वर्ष यूँ ही यह बढ़ता रहेगा और आपको जलाता रहेगा। मेरे ओलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। आगे यह ईंट के आकार तक पहुँचने वाले हैं। सारे पेड़ तो आपने काट डाले, अब हवा में ऑक्सीजन भी नाममात्र को रह जायेगी। बारिश को भी तरसने वाले हो आप। जल्द ही पेयजल की बूँद भी नसीब नहीं होगी। मेरे ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। ये गंगा नदी भी अब स्वच्छ नहीं रहेगी। प्लास्टिक के कारण मेरी मिट्टी भी बंजर हो चुकी है। अब फसलें भी मुश्किल से उगेंगी।

 आप लगातार जनसंख्या बढ़ा रहे हो। कहाँ से पूर्ति करूँ मैं आपकी?? बस, अब और नहीं। आप कभी नहीं सुधरोगे। कभी मुझे बचाने की कोशिश नही करोगे। मैं जानता हूँ, मेरा समय अब नजदीक आ चुका है। मैं अब पूरी तरह तहस-नहस होने वाला हूँ। 

किन्तु याद रखो, मेरे समाप्त होने से पहले आप समाप्त हो जाओगे। आपकी पीढ़ियाँ, यह मानव जाति समाप्त हो जाएगी। कुछ नही बचेगा इस धरा पर। मेरे साथ ही यह धरती समाप्त हो जाएगी।

काश, आप समझ पाते! मुझे नहीं तो खुद को ही बचाने की कोशिश करते, अपनी पीढ़ियों को भी इस धरती का सुख भोगने का अवसर देते। केवल सोशल मीडिया पर फोटो डालकर अपने कर्त्तव्य की पूर्ति ना करते। खुद फील्ड में निकलकर मेरे संरक्षण हेतु जमीनी स्तर पर कार्य करते। मैं अभी मरना नहीं चाहता। क्या आप सब मुझे बचा पाओगे?????

काश......................

लेखिका
रीता गुप्ता,
सहायक अध्यापक, 
मॉडल प्राइमरी स्कूल बेहट नंबर-एक,
जनपद-सहारनपुर।

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