भूल

सम्मानित साथियों, आज हम सामाजिक सरोकारों को भूल कर अपने संस्कारों को भी छोड़ चुके हैं। अभी हमने तथाकथित फादर डे मनाया है। लेकिन यह भी उतना बड़ा सच है कि उसी पिता की भावनाओं को सरे बाजार आज की संतानें बड़ी बेदर्दी से रौंद रही हैं। एक पिता चार संतानों को बड़े अरमानों से पाल लेता है, लेकिन चार संतानों पर एक माता-पिता का पालन नहीं किया जाता है।
   बस इसी भावना से प्रेरित, मेरी कलम से कुछ पंक्तियाँ निकल गई हैं, यदि आपके दिल को छू जाये तो मुझे अवश्य बताना और इसे शेयर करना शायद किसी पिता को उसका सम्मान वापस मिल जाए..

उँगली पकड़ कर चलना,
सिखाया था जिनको।
तन काटकार अपना,
पढ़ाया था जिनको।
रोक कर रास्ते अपने,
आगे बढ़ाया था जिनको।
जरूरतों को मारकर अपनी,
बेफिक्र किया था जिनको।
वे खुश हैं सभी अपनी मंजिलों को पाकर,
और मैं खुश था उनकी मंजिलों को देखकर।
बस भूल हो गई एक मेरी,
मैने एक ख्वाब देख लिया।
अपने बुढापे की लाठियों का,
भरम आजमा लिया।
बस पूछ बैठा यों ही,
कि बुढ़ापे में हमें कौन देखेगा।
हमारी सेवा का पुण्य अब,
तुम में से, कौन ले लेगा।
मौन हो गया बह ड्रॉइंग रूम,
जहाँ किलकारियाँ गूंजती थी।
मन मलिन हो गया,
जहाँ शहनाईयाँ बजती थीं।
सभी बच्चे एक-दूसरे को,
देखने में लग गए।
भावनाओं का सौदा,
अब वे करने में लग गए।
एक अच्छे व्यापारी की भाँति,
उनमें से एक बोल गया।
मेरे संस्कारों को छोड,
मेरी भावनाओं को तोल गया।
बोला बंटबारा कर दो,
और हमें बंधन से मुक्त कर दो।
मैं विचारों से शून्य हो गया,
एक बार फिर मेरे कंधों पर,
मेरा ही बोझ आ गया।
एक बार फिर मेरे कधों पर,
मेरा ही बोझ आ गया।
    
रचयिता
डॉ0 ललित कुमार,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय खिजरपुर जोशीया, 
विकास खण्ड-लोधा, 
जनपद-अलीगढ़।

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