तपते रवि से

तपते रवि से,
आग निकलकर।
उतरी-आयी भू पर।
तृण प्राण सूखते,
तपते आतप सहते।
क्षण-क्षण प्यासे रहकर।
तपन तप रही, कितनी?
बिकल हुई सी अवनी।
अग्नि बरसती जैसे।
ठण्डी छाँव पेड़ की,
चुप बैठा बेबस समीर।
अंशुमाल से भय आतुर।
वनचर खगकुल आकुल,
पथिक पंथ के व्याकुल।
खोज रहे छाया सुखमय,
शीतल मृदुजल।
स्वर मंद निबल से,
चल रहे विकल से।
जल बिन जीवन, आतुर-विहृवल।
तपते रवि से,
बच बच कर, चलते पथ पर।
पर, कुछ जीवन सपने।
पल पल हैं वे जीने।
जीवन जीना भी,
अविरल चलना भी।
जल-जीवन सह-सम्बंधित।
यह जीवन रीति सुनिश्चित।
तिनका-तिनका जल से जीकर,
जाता जीवन देकर।
ग्रीष्म, शीत, वर्षा,
पुनः पुनः आकर,
परिवर्तन कर।
तपते रवि से,
प्रेरित होकर,
आते-जाते प्रकृति चक्र बनकर।।

रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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