वृक्ष
(गीत)तर्ज़- प्रेम की गंगा बहाते चलो, सबको गले से लगाते चलो...
नित नये वृक्ष लगाते चलो, पर्यावरण को बचाते चलो।
वृक्ष हमें फल, फूल हैं देते, बीज भी देते शाक-सब्जी भी देते।
घर के लिए इमारती लकड़ी भी देते, भोजन पकाने को ईंधन भी देते।
वृक्ष का महत्व बताते चलो, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
जीवन का आधार वृक्ष हैं, सबके लिए वरदान वृक्ष हैं।
कार्बन-डाइ-ऑक्साइड सोखते वृक्ष हैं, ऑक्सीजन का भण्डार वृक्ष हैं।
शुद्ध वातावरण निर्मित करने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
जीव- जंतु का पोषण हैं करते, पशु-पक्षियों को आश्रय हैं देते।
मानवजाति का कल्याण करते, भूमण्डल को अनुकूल करते।
सबका अस्तित्व बचाने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
तपती धरा हो, धूप तेज़ हो, आँधी-तूफ़ान घनी वर्षा हो।
भूमि स्खलन हो या अकाल हो, मृदा अपरदन, जल प्लावन हो।
प्राकृतिक आपदाओं से बचाने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
नित नये वृक्ष लगाते चलो, पर्यावरण को बचाते चलो।
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।
वृक्ष
नित नये वृक्ष लगाते चलो, पर्यावरण को बचाते चलो।
वृक्ष हमें फल, फूल हैं देते, बीज भी देते शाक-सब्जी भी देते।
घर के लिए इमारती लकड़ी भी देते, भोजन पकाने को ईंधन भी देते।
वृक्ष का महत्व बताते चलो, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
जीवन का आधार वृक्ष हैं, सबके लिए वरदान वृक्ष हैं।
कार्बन-डाइ-ऑक्साइड सोखते वृक्ष हैं, ऑक्सीजन का भण्डार वृक्ष हैं।
शुद्ध वातावरण निर्मित करने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
जीव- जंतु का पोषण हैं करते, पशु-पक्षियों को आश्रय हैं देते।
मानवजाति का कल्याण करते, भूमण्डल को अनुकूल करते।
सबका अस्तित्व बचाने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
तपती धरा हो, धूप तेज़ हो, आँधी-तूफ़ान घनी वर्षा हो।
भूमि स्खलन हो या अकाल हो, मृदा अपरदन, जल प्लावन हो।
प्राकृतिक आपदाओं से बचाने को, नित नये वृक्ष लगाते चलो।।
नित नये वृक्ष लगाते चलो, पर्यावरण को बचाते चलो।
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

समसामयिक रचना।बहुत सुन्दर।
ReplyDeleteसतीश चन्द्र"कौशिक"