प्यासा परिंदा

विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में एक प्यासे परिंदे की व्यथा--

एक प्यासा परिंदा उड़ता हुआ,
धरती पर आया..
पर धरा को उसने,
निर्जल ही पाया...
यह देख वह कुछ सकुचाया,
प्यास के कारण,
वह किंचित अकुलाया...
व्याकुलता से उसकी आँखें पथरायीं,
सूखी जिह्वा न कुछ कह पायी...
आसमान से बरस रही थी आग,
सूखी हुयी दरिया,
कर रही थी चीत्कार...
पर परिंदे को थी,
आसरे की तलाश,
उड़े जा रहा था बस इसी आस...
कि पा सके कोई झरोखा,
जो जीवन दे उसे...
थोड़ा सा झुरमुट ही सही,
जो छाँव दे उसे...
मुरझाए हुए खेतों में,
अन्न का दाना न मिला...
जठराग्नि समाप्त करने का,
कोई ठिकाना न मिला...
गर्म हवा के थपेड़े,
उसे तड़पा रहे थे...
उसके परों को जलाकर,
प्राण पखेरू उड़ा रहे थे...
अंतिम समय बस यही सोच रहा था,
वसुधा का अंत,
उसके जीवन से हो रहा था...
मनुष्य ने यदि पर्यावरण सम्भाला होता,
उसके शरीर ने न इस तरह प्राणों को निकाला होता।

रचयिता
पूजा सचान,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मसेनी(बालक) अंग्रेजी माध्यम,
विकास खण्ड-बढ़पुर,
जनपद-फर्रुखाबाद।

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