हम पर्यावरण बचाएँ

1

संग प्रगति के अभिनव चिन्तन,
आओ करते जाएँ।
जल, थल और पवन पर किंचित,
ध्यान आज ठहराएँ।
सम्प्रति बढ़ता जाता यहाँ प्रदूषण,
भू, जल और पवन में।
विष और रसायन तो बढ़ते जाते,
रोग, शोक हैं जीवन में।
हम सब ही उत्तरदायी इसके हैं,
सबको यही बताएँ।
अँधाधुंध कटाई वन बागों की होती,
सूनी हुई दिशाएँ।
हरित हरित हो वसुधा का आँगन,
यह संकल्प जगाना।
जैविक घटकों पर निर्भर होकर अब,
उर्वर भूमि बनाना।
हर स्थल पर वृक्ष लगाकर अब तो,
हम पर्यावरण बचाएँ।
खाद रसायन कीट नियंत्रण के नूतन,
जैविक प्रयोग अपनाएँ।
सुखमय जीवन की अब नई कहानी,
हमको लिखना होगा।
जीव-जगत और मानवता पर कुछ,
विचार करना होगा।
यह पर्यावरण हमारा है जीवन अपना,
जन जन को समझाएँ।
स्वचछ समुन्नत हो परिवेश हमारा,
आओ संकल्प जगाएँ।
        हम पर्यावरण बचाएँ।

2

पर्यावरण और हम

वृक्ष लगाओ अब स्थल-स्थल,
भारत भू के हर अंचल-अंचल।

स्वच्छ सजीला परिवेश बनाएँ,
हम शुद्ध पवन का स्रोत बढ़ाएँ।
विष और रसायन बढ़ते जाते,
बाग बगीचे वन हैं कटते जाते।
जीवन पर संकट छाया पल-पल,
बढ़़ रहा प्रदूषण देखो अविरल।

साथ प्रगति के हो ऐसा चिन्तन,
प्राकृतिक स्रोतों का हो संरक्षण।
सुखी बने यह मानवता सारी,
जन-जन की है यह जिम्मेदारी।
आज चतुर्दिक है बढ़ा प्रदूषण,
दूषित होता है प्रकृति आवरण।
अब ना बहती सरिता कल-कल,
वृक्षों में भी फलित न होते फल।

तापमान यह बढ़ रहा निरन्तर,
मिल रहा प्रकृति से देखो उत्तर।
हम विकास के पथ पर चलते,
किन्तु नहीं हम  चिन्तन करते।
अगर हमें है जीवन सुख को पाना,
फिर मिलकर पर्यावरण बचाना।
सोंचो अब हों वन उपवन जंगल,
नदियाँ बहती हों अविरल निर्मल।।
अगर हमें है जीवन सुख को पाना।

रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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