पर्यावरण

      हमारे चारों ओर से घिरा आवरण,
       पृथ्वी, नभ, नीर, जैव, अजैव कण-कण,
       सब मिलकर बनाता प्राकृतिक वरण,
       है कहलाता हमारा "पर्यावरण"।

भौतिक सुख सुविधा हेतु उत्तरोत्तर,
इसका  हो  रहा  अनवरत   क्षरण।
कल-कारखाने, ए सी, गाड़ी-मोटर,
इनसे बिगड़ रहा प्राकृतिक पर्यावरण।।

        घटते घट-घट सब बाग वृक्ष-बन,
       नभ में छाता No2, CO, CO2सघन।
        बढ़ती  उत्तरोत्तर  धरा  तपन,
        बढ़ती ध्रुवों पर हिम-पिघलन।
       घटता गिरि की चट्टानों से हिमावरण,
      संकट के बादल से घिरता पर्यावरण।

हर्बीसाइड्स, पेस्टीसाइड्स, रसायन उर्वर,
अंधाधुंध होता जिनसे फसलों का पोषण।
मृदा संघटन में छाता उत्तरोत्तर दोषण,
घटते कृमि भूमि के और जीवाश्म स्तर।
घटती जाती धरा की शक्ति भूउर्वर,
संकट बढ़ता घट-घट हमारे पर्यावरण।

      कर-कर उन्मूलन रासायनिक उर्वर,
      धरा पर कर-कर नित वृक्षारोपण,
      करके शौच हेतु प्रयोग शौचालय घर,
      ला दो फिर से नैसर्गिक पर्यावरण।।

तब मिले विजय, बिगड़ते पर्यावरण पर

रचयिता
विजय मेहंदी,
सहायक अध्यापक,
KPS(E.M.School)Shudanipur, Madiyahu,
जनपद-जौनपुर।

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