तपती धरती

तपती धरती तपता सूरज,
क्यूँ तपते इतने सूरज दादा,
सूखे पत्ते, सूखी धरती,
नदी, नाले, तालाब,
सब सूखे जाते।
माँ मुझको समझा,
कहाँ गया नदियों का सारा पानी,
माँ ने बच्चे को समझाया,
जो बोओगे वही तो काटोगे,
बोया पेड़ बबूल का,
तो आम कहाँ से होय,
विकास के नाम पर,
विनाश किया हमने,
खुद को भगवान से भी,
ऊपर समझा हमने,
अपनी साँसों का भी,
न ख्याल रखा हमने,
की पेड़ों की अंधाधुंध कटाई।
नहीं चेते अब भी मेरे बच्चे,
परिणाम होगा बहुत बुरा,
भर आती हैं मेरी आँखें,
सोचती हूँ,
अपनी करनी का फल,
स्वयं ही भोगना पड़ेगा,
लेकिन,
लेकिन हमारी करनी का फल,
हमारी कई पीढ़ियों को,
भोगना पड़ेगा।

रचयिता                                  
चंचला पाण्डेय,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मसीरपुर, 
विकास खण्ड-बिलरियागंज, 
जनपद-आज़मगढ़।

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