अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक,60,अंजू चौबे ,वाराणसी
*👩🏻🏫अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक*
*मिशन शिक्षण संवाद परिवार की बहनों की संघर्ष और सफ़लता की कहानी*
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*👩👩👧👧महिला सशक्तीकरण- 60*
(दिनाँक- 01 मई 2019)
नाम:-अंजू चौबे
पद-सहायक अध्यापक
विद्यालय- पूर्व माध्यमिक विद्यालय केराकत पुर,काशी विद्यापीठ, वाराणसी
सफलता एवं संघर्ष की कहानी :-
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शिक्षक कभी साधारण हो ही नहीं सकता क्योंकि प्रलय और निर्माण शिक्षक की गोद में पलते हैं तत्कालीन युग निर्माता चाणक्य का यह कथन मेरे मन मस्तिष्क में शुरू से अंकित है ।
लेकिन आप सभी इस बात से सहमत होंगे कि अगर शिक्षक एक महिला है और समर्पित है तो सिर्फ और सिर्फ निर्माण और बच्चों का स्वर्णिम भविष्य
क्योंकि एक महिला शिक्षिका होने के साथ-साथ एक मां भी होती है और शायद इसीलिए कहा भी गया है बालक की प्रथम गुरु उसकी मां ही होती है
इसी विचारधारा को मन में संजोए मैंने भी शिक्षिका बनने का संकल्प लिया और प्रथम प्रयास में ही 1999 में मेरा शिक्षिका के रूप में वाराणसी जनपद में चयन हुआ मैं यह मानती हूं शिक्षक सिर्फ सिखाता ही नहीं हमेशा सीखता भी रहता है और यही उसके व्यक्तित्व को नया आयाम देता है इसी सीखने सिखाने के क्रम में सन 2002 में मेरा तबादला गौतमबुद्ध जनपद में हो गया
जब मैं वहां पर बीएसए ऑफिस में ज्वाइन करने गई तो उसी समय एक इंचार्ज प्रधानाध्यापक रिछपाल सिंह यह कह रहे थे मेरे यहां स्टाफ कम है विद्यालय सुचारू रूप से चलाने के लिए मुझे शिक्षक की आवश्यकता है उसी समय तत्कालीन बीईओ अंसारी सर जो शायद मुझे वाराणसी से ही जानते थे उन्होंने कहा मैं आपको एक ऐसा शिक्षक देता हूं जो अकेला 3 के बराबर काम करेगी उसके बाद जब उन्होंने मेरा नाम लिया तो बस वह अविस्मरणीय पल
पर कुछ सालों बाद परिस्थितियां काफी विपरीत हो गई मेरे पति की मृत्यु हो गई जीवन काफी झंझावातों से भर गया ,पर फिर भी एक शिक्षिका के रूप में मैंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरे मनोयोग से किया और वही मेरे जीने का संबल और आगे बढ़ने का प्रेरणा स्रोत भी बना
पुनः 2016 में मै वाराणसी जनपद में तबादला लेकर आई और जिस विद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया वहां की इंचार्ज प्रधान अध्यापिका श्रीमती सरिता राय जी का यह कहना कि अंजू के रूप में मुझे दाहिना हाथ मिल गया और मैं दुगने जोश से बच्चों के भविष्य को रचनात्मक दिशा देने में जुट गई और यह हमारे सभी बड़ों का विश्वास और आशीर्वाद ही था कि मैंने जिस भी चीज को बच्चों को सिखाया बच्चे हमेशा उसमें विजयी और पुरस्कृत होते रहे और मुझे भी समय-समय पर काफी सम्मान और प्रशसतियां पाने का अवसर मिला और मैं वर्तमान में मिशन शिक्षण संवाद से जुड़कर शिक्षा के नित नए आयामो और विभूतियों से परिचित होती रहती हूं जो मेरे लिए गर्व की बात है ।
_✏संकलन_
*📝टीम मिशन शिक्षण संवाद।*
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