दहेज

पूजते हो बेटियाँ और मानते हो देवियाँ
आज उसे पैसों से तौलने की हिम्मत दिखाते हो।

माँगकर दहेज लड़की के पिता से
ए नादान तुम अपने ही बेटे की कीमत लगाते हो।।

जो अपने अरमानों को कुचलकर तुम्हारा घर सजाती है
उस लक्ष्मी स्वरूप की बोली लगाते हो।

जो खुद टूटकर दो घरों को जोड़ती है
उस सहनशीलता को तुम पैसों में मापते हो।

शर्म उसका गहना है, उसे हर कदम पर ये सिखाते हो
दहेज माँगते वक़्त, क्या अपनी ही शर्म कहीं बेच आते हो।

बोली लगाते हो लड़कों की पर शर्मसार मुझे करते हो
अरमानों की मेरी बोली लगाकर कर्ज लेकर के मेरी दुनिया सजाते हो।

कहते तो हो मुझे लक्ष्मी, पर लक्ष्मी  के खातिर ही मुझे जिंदा जलाते हो।
हर एक लड़की का अरमान होता है कि उसका पति अनमोल हो

पर बिना उससे पूछे उसके लिए महँगेसे महँगा वर खरीदकर लाते हो।

मै तो आपकी गुड़िया थी फिर क्यूँ
मुझे दहेज के दरिंदों के हाथों में सौंप आते हो।।
       
रचनाकार
पूजा दुबे,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बिहारा-1,
विकास क्षेत्र व जनपद-चित्रकूट।

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