मातृ दिवस
"माँगूँ मैं भगवान से फिर से मुझे यही जहां मिले, फिर वही जहां और फिर से मुझे यही माँ मिले।" आज मातृ दिवस है। हर दिवस की तरह एक दिन अब मातृ दिवस का भी बनाया गया है। पर माँ के लिए कोई एक दिन तो होता नहीं है। जन्म से लेकर जब तक माँ रहती है तब तक हमारा हर दिन माँ से ही शुरू होता है। "ले लला! चाय, या ले बिटिया खाना।"अब तो हम सब लोग खुद ही बच्चों वाले हो गए हैं, और माँ-बाप बन चुके हैं। लेकिन अगर माँ और पिता हैं, तो हम लोग अभी भी बच्चे ही हैं।
जब हम जन्म लेते हैं तब से म-म-म-म से ही शुरू करते हैं और हम कब माँ के साए में रहकर बड़े हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता है और फिर हमारा विवाह हो जाता है। माँ फिर जुट जाती है हमारे बच्चों को पालने के लिए। माँ का प्यार वही रहता है जो हमारे लिए है वही हमारे बच्चों के लिए होता है।
आजकल हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपनी माँ को बहुत कम समय दे पाते हैं। माँ कुछ नहीं चाहती है, सिर्फ चाहती है कि हम उससे थोड़ी सी बात कर लें। वैसे भी माँ हमें कभी भी अपना दुःख नहीं बताती है, चाहे वह कितनी भी बीमार हो सदैव यही कहती है कि मैं सही हूँ और मैं सही हूँ, यह कहते-कहते ही एक दिन ऐसा आता है कि माँ अनगिनत बीमारियों की शिकार हो जाती है।
आज का दिन सिर्फ माँ के साथ सेल्फी के साथ ही न सिमट जाए बल्कि हर रोज माँ का साथ रहे, मैं अपनी माँ को आज के दिन तोहफा जरूर देती हूँ। और जब भी माँ को किसी चीज की जरूरत होती है मैं उन्हें लाकर देती हूँ। जबकि वह यही कहती हैं,-" जाकी का जरूरत हती!" हमें लगता है कि अगर हम इस लायक हैं कि माँ की जरूरत को पूरा कर सकें, तो हमें करना चाहिए। क्योंकि हमें एक कटु सत्य पता है कि की माँ जीवन भर हमारे साथ नहीं रहेगी।
माँ चली जाएगी हमें छोड़कर उस आसमान में जाकर एक तारा बन जाएगी और वहाँ से भी हमें ताका करेगी और सोचा करेगी अरे! मेरे बच्चे बहुत परेशान हैं। वहाँ पर भी उसको चैन नहीं होगा, इसलिए जब तक माँ है कद्र कर लो, बाद में बहुत पछतावा होता है। जो खिलाना है खिला लो, जहाँ घूमना है, घुमा दो। जो मन कहे उसे पूरा कर दो, अपने मन से करो।
इंसान की अहमियत जीते जी करो मरने के बाद कुछ नहीं रहता है, फिर चाहे मृत्यु भोज करो या फिर शांति पाठ करो। दुनिया की भी आँखें कभी बंद नहीं होती हैं, आप उसे जो दिखाना चाहते हो उससे पहले ही वह सब कुछ देख चुका होता है। जिसके घर में दो रोटी खाकर भी माँ-बाप खुश हैं, उस घर में ही सच्ची शांति है।... यह सिर्फ मेरे अपने मन के विचार हैं।
लेखिका
शालिनी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बनी,
विकास खण्ड-अलीगंज,
जनपद-एटा।

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