माँ
बिन देखे मुझको चाहा था
मन्नत का भी बाँधा धागा था।
हर दर पे तूने माथा टेका था
जब भी मेरा माथा दुखा था।
दवा पे तुझे कहाँ भरोसा था
अजमाया हर जादू टोना था।
जब से जग से मैं आया था
बस तेरा मिला सहारा था।
तू जागी मैं चैन से सोया था
तू रोई जब-जब मैं रोया था।
मेरे संग तूने भी जिया था
जो बचपन तूने खोया था।
मै तेरा एक खिलौना था
तेरे संग हँसना, रोना था
अल्फाज नही मिलते मुझको
कैसे कहूँ जो कुछ कहना था।
हर जनम में तेरा साथ मिले
मेरा बस ऐसा एक सपना था।
रचयिता
मनीषा सिंह,
सहायक अध्यापक,
कंपोजिट विद्यालय सुरेहरा,
विकास खण्ड-एत्मादपुर,
जनपद-आगरा।

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