यही उसकी नियति है

   वह शाम को कम करके घर लौट रहा था। रास्ते में उसने देखा कि एक बिल्डिंग दुल्हन की तरह सजी हुई थी। बड़े-बड़े लोग आ रहे थे। खूब गाड़ियाँ खड़ी थीं। उसके मन में उत्सुकता हुई। पता तो करें यहाँ क्या हो रहा है। पता किया तो मालूम हुआ कि इस बिल्डिंग में शॉपिंग मॉल खुल गया है। आज उसी का उद्घाटन है। इसीलिए यह चहल-पहल है।
      अचानक उसे याद आया कि यह बिल्डिंग तो उसी ने बनाई है। उसके मन में एक लगाव सा उतपन्न हो गया। वह बड़ी हसरत से उस बिल्डिंग को देख रहा था। जैसे एक मूर्तिकार अपनी बनाई हुई मूर्ति को देखकर खुश होता है। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह इतनी अच्छी बिल्डिंग बना लेता है। वह बार-बार उस मॉल को देख रहा था। जैसे वह अपनी रचना को आँखों में बसा लेना चाहता हो।
   तभी उसके मन में विचार आया कि ये बिल्डिंग बाहर से इतनी अच्छी है तो अंदर भी अच्छी होगी। चलो देख लेते हैं।आखिर मेरी बनाई हुई ही तो है। पर यह क्या?
   जब वह अंदर जाने लगता है तो वहाँ खड़े गार्ड उसे अंदर जाने से रोक देते हैं। वह बहुत कोशिश करता है। जबरदस्ती भी करता है अंदर जाने की। पर वह असफल रहता है। तब वह गार्ड से उस बिल्डिंग के मालिक को बुलाने के लिए कहता है। मालिक आया है और उसकी वेशभूषा देखकर पूछता है कि क्या है?
    तब वह बोलता है कि "यह बिल्डिंग मैंने बनाई है इसमें सीमेंट के साथ मेरी पसीने की बूँदें भी मिलीं हुई हैं। मैं एक नजर इसको अंदर से देखना चाहता हूँ।"
   तब मालिक उसको हिकारत भरी नजरों से देखता है और कहता है-"अपनी सूरत देखी है आईने में। यहाँ सब बड़े-बड़े लोग हैं और तुमने बनाई है तो मैंने पैसे भी तो दिए हैं तुम्हें।"
   तब वह आहत होकर कहता है - "सिर्फ पैसों से ही बिल्डिंग बन जाया करतीं हैं क्या साहब?"
    आखिर वह अंदर नहीं जा पाता है। बिल्डिंग देखने की उसकी हसरत वहीं दम तोड़ देती है। पैसों की चमक-दमक में बनाने वाले का अस्तित्व ही कहीं गुम हो जाता है।
    क्योंकि वह एक 'मजदूर' था, राज मिस्त्री बिल्डिंग का निर्माता। पर गुमनामी में जीना ही उसकी नियति है।
      आज मजदूर दिवस है। नमन है उन मजदूर भाई बहिन और बाल मजदूरों को जिन्हें पेट भरने के लिए मजबूरी में ये काम करना पड़ता है। उनके लिए बधाई या हैप्पी मजदूर दिवस का कोई मतलब नहीं होता।
   नमन है उन्हें जिनका हमसे कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता लेकिन उनके बिना हमारा जीवन असम्भव होता है। अगर वे न होते तो गगनचुम्बी इमारतों सड़कों पुलों आदि का कोई अस्तित्व न होता और हमारी शानो शौकत भी न होती। इन सब को मजदूर अपने खून-पसीने से सींचकर बनाते हैं। कई बार अपनी जान भी गंवा देते हैं और उन्हीं का न कहीं नाम होता है और न कोई वजूद केवल गुमनामी के सिवा।
          
लेखिका
जमीला खातून, 
प्रधानाध्यापक, 
बेसिक प्राथमिक पाठशाला गढधुरिया गंज, नगर क्षेत्र मऊरानीपुर, 
जनपद-झाँसी।

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