अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी

नारी शक्ति से जग परिचित है;
मैं भी अब लड़ जाऊँगी।
शक्ति रूपेण  पहचान हमारी;
मैं भी कुछ कर जाऊँगी॥
हर जगह हमारा परचम है;
वैदिक हो या युग आधुनिक।
अबला ना समझ लेना मुझको;
अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी॥

अब जुल्म नहीं . . . . . . . . . .

ममता में माँ का आँचल हूँ;
ऋतुओं में बसंत की हरियाली।
प्रेम में रूप सावित्री का;
क्रोध में हूँ मैं महाकाली॥
पग-पग राहों में काँटे हैं;
पर अपने वजूद को लड़ जाऊँगी॥

अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी॥
अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी॥

नारी हूँ मैं बस एक नारी;
पद, धर्म, रिश्ते हैं अनेक हमारे भी।
माता, बहना, पत्नी, बेटी हूँ;
निभाओ ये रिश्ते तुम्हारे भी॥
कदम बढ़ाओ साथ चलने को;
इन रिश्तों पर मर जाऊँगी॥

अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी
अब जुल्म नहीं सह पाऊँगी

रचयिता 
गीता यादव,
प्रधानाध्यपिका,
प्राथमिक विद्यालय मुरारपुर,
विकास खण्ड-देवमई,
जनपद-फ़तेहपुर।

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